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लड़कियों के अश्लील इशारों, बेशर्म बयानी और हद दर्जे की हरकतों से जंतर मंतर भी हैरान

  • क्या हमारी यही जेन – जेड की असली तस्वीर ?

    नई दिल्ली का जंतर-मंतर। कई बदलावों का गवाह है। सरकारें बदलीं। नारे बदले। मांगें बदलीं। चेहरे बदले। अनशन और आंदोलनों के तौर भी बदले और तरीके भी बदले। माना कि समय बहुत कुछ बदल देता है। लेकिन इस बार जो दिखा, उसने सबको ठिठका दिया। विरोध के मंच पर तर्क कम थे। तेवर ज़्यादा थे। नारे कम थे। गलियां ज़्यादा थीं। भाव कम थे, भद्दे इशारे ज्यादा थे। सबसे ज़्यादा हैरानी तब हुई, जब छोटी-छोटी उम्र की लड़कियां कैमरों के सामने बेशर्मी से गंदी गंदी गालियां बकती दिखीं। हाथों में ऐसे पोस्टर थे, जिन्हें सभ्य समाज में ज़ोर से पढ़ना भी शर्मनाक लगे। प्रदर्शन में सामग्री अंतरंग अंगों से आजाद होकर निकली थी। सोशल मीडिया के कैमरे चालू होते ही कुछ चेहरों पर मानो अभिनय शुरू हो जाता था। जितनी ज्यादा गंदी गालियां, उतने ही ज्यादा लाइक्स और व्यूज़। जितनी तीखी भाषा, उतनी ज़्यादा चर्चा। और जितने बेशर्म इशारे, इतने ही ज्यादा दर्शक।

    क्या यही विरोध का नया पैमाना है ? क्या अब आंदोलन की सफलता इस बात से तय होगी कि किसने सबसे गंदी गाली दी? किसने सबसे ज़्यादा भद्दे इशारों से सनसनी पैदा की? जंतर मंतर ने इतनी गालियां, इतने भद्दे इशारे और इतनी बेशर्म हरकतें इससे पहले कभी नहीं देखी या सुनी होंगी, जितनी कॉकरोच जनता पार्टी के इस प्रदर्शन में। जंतर मंतर का यह माहौल प्रदर्शनकारियों के संस्कार और पारिवारिक विरासत का प्रतीक भी है।
    भारत की बेटियों की पहचान कभी ऐसी नहीं रही। इस देश की बेटियों ने सीमा पर वर्दी पहनकर सम्मान कमाया है। विज्ञान में खुद को रोशन किया है। खेलों में तिरंगा लहराया है। अदालतों में न्याय की लड़ाई लड़ी है। संसद में दमदार भाषण दिए हैं। और विरोध प्रदर्शन भी शालीनता से करके खुद को गरिमामयी बनाया है। उन्होंने अपनी बात रखी, लेकिन अपनी गरिमा छोड़े बिना।
    यही तो स्त्री की असली ताकत रही है। इसलिए जब सार्वजनिक मंच पर जेन – जेड की नौजवान होती पीढ़ी की लड़कियां अश्लील भाषा, गंदी हरकतें, भद्दे इशारे और अपशब्दों से आरती उतारती दिखाई देती हैं, तो सवाल केवल राजनीति का नहीं उठता। सवाल समाज का उठता है और उनके परिवार के संस्कारों से जुड़ता है।
    कैमरे के सामने खड़े होकर जो कहा जाता है, वह केवल वहीं नहीं रह जाता। वह मोबाइल की स्क्रीन से होकर घर तक पहुंचता है। मां-बाप तक जाता है। भाई-बहनों तक पहुंचता है। रिश्तेदारों तक भी जाता है। उनके शिक्षक भी उसे देखते हैं। पड़ोसी भी देखते हैं। तब मन में एक प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या यही अभिव्यक्ति का आदर्श है?
    लोकतंत्र में असहमति का अधिकार है। होना भी चाहिए। सत्ता से सवाल पूछिए। नीतियों का विरोध कीजिए। सड़क पर उतरिए। लेकिन क्या विरोध का मतलब भाषा की सारी सीमाएं तोड़ देना है? जिस दिन गाली तर्क की जगह ले लेती है, अश्लील नारे और गंदे इशारे विरोध की बुलंदी का स्वर बनते हैं और विरोध करने की जिद में अगले की मां – बहन के अंगों की विकृत व्याख्या ही उसके अपमान का पैमाना बन जाए, बहस उसी दिन हार जाती है।
    यह एक नई बीमारी है। कैमरा देखते ही कुछ लोग संवाद नहीं, प्रदर्शन करने लगते हैं। जितनी गंदी भाषा, उतने ही अधिक व्यूज़। जितनी शर्मनाक शैली, उतनी ज़्यादा वायरल क्लिप। मानो शालीनता अब आउटडेटेड हो गई हो।
    यह प्रवृत्ति चिंताजनक है।
    राजनेताओं और राजनीतिक विरोध के आयोजकों को भी सोचना होगा। उनको समर्थकों को भी। और सहभागियों को भी। यदि मांगों से ज़्यादा उसकी भाषा आंदोलन की पहचान बनने लगे, तो समझिए कि संदेश पीछे छूट गया और शोर आगे निकल गया। आंदोलन इतिहास बदलते हैं। लेकिन इतिहास उन्हें याद रखता है, जिन्होंने समाज को जोड़ा; उन्हें नहीं, जिन्होंने केवल शोर पैदा किया।
    लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि विरोध की आवाज़ दबाई नहीं जानी चाहिए। लेकिन लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यह भी है कि विरोध सभ्य हो, संयमित हो और ऐसा हो, जिसे देखकर अगली पीढ़ी सीखे, शर्मिंदा न हो।
    भारत की बेटियां शक्ति का प्रतीक हैं। संस्कार का भी। आत्मविश्वास का भी। और अगली पीढ़ी के निर्माण का भी। उनसे समाज की अपेक्षा केवल साहस की नहीं, गरिमा की भी रहती है। गाली से गलत लोगों की तालियां मिल सकती हैं, सम्मान नहीं। अश्लील इशारों और बेशर्म बवालों से कुछ पल की प्रसिद्धि मिल सकती है। विश्वसनीयता नहीं।
    जिस आंदोलन में गरिमा टूट जाए और मर्यादा छूट जाए, वहां सबसे पहले उसी आंदोलन की नैतिक ताकत कमज़ोर पड़ती है। विरोध कीजिए। पूरे अधिकार से कीजिए। लेकिन इतना याद रखिए कि लोकतंत्र की आवाज़ जितनी बुलंद हो, उसकी भाषा उतनी ही गरिमामयी हुई होनी चाहिए। क्योंकि, अब शब्द केवल उसी दौर में उसी जगह सुने नहीं जाते, वे बरसों बरस तक सुनाई देते हैं, पीछा करते हैं और सदा के लिए सामने खड़े रहते है।
    कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में जो गलियां बोली जा रही हैं, शर्मनाक इशारों के साथ प्रदर्शन किया जा रहा है और अंतरंग अंगों की छुपाई जाने वाली सामग्री को शर्मनाक तरीके से प्रदर्शित किया जा रहा है, वह सचमुच शर्मनाक है। लेकिन लगता है इस नए समाज की नई पीढ़ी का नया चरित्र भी यही हैं। और अगर यही असल चरित्र है, तो हमारी अगली पीढ़ी का क्या भविष्य होने जा रहा है, यह तय कर लीजिए। और तय यह भी करना होगा कि ये ही गंदी गालियां, भद्दे इशारे और बेशर्म बयानी करती बला की खूबसूरत बालाएं अपना क्या भविष्य गढ़ रही हैं, यह वे ही जाने!
    (लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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