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गणेशोत्सव को असल मुद्दे निभाने होगे।

   भारत एक उत्सव प्रधान देश है। यहां हर सप्ताह कोई ना कोई त्योहार साजरा किया जाता है। गणेशोत्सव उन्ही महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है।
जब भी हम कोई पूजा या अनुष्ठान करते हैं तो सर्वप्रथम गौरी नंदन गणेशजी की उपासना करते हैं। सभी देवताओं में प्रथम पूज्य माने जाने वाले गणेश जी का अवतरण दिवस गणेश चतुर्थी का पावन पर्व देश ही नहीं। अपितु विश्वभर के सनातन धर्मावलम्बियों द्वारा बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। चारों तरफ उत्सव ही उत्सव, बस सबके मन में एक ही इच्छा कि “हे विघ्नहर्ता हमारे भी बिगड़े काम बनाओ,हमारे विघ्नों को हरो।”
ज्ञात इतिहास के अनुसारए यह अनुमान लगाया गया है कि गणेश चतुर्थी 1630-1680 के दौरान छत्रपति शिवाजी महाराज,मराठा साम्राज्य के संस्थापक के समय में एक सार्वजनिक समारोह के रूप में मनाया जाता था। शिवाजी के समय, यह गणेशोत्सव उनके साम्राज्य के कुलदेवता के रूप में नियमित रूप से मनाना शुरू किया गया था। पेशवाओं के अंत के बाद यह एक पारिवारिक उत्सव बना रहा। जिसे 1893 में स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक बाल गंगाधर लोकमान्य तिलक द्वारा पुनर्जीवित किया गया।
अंग्रेजो के शासनकाल में धारा 144 के तहद एक साथ पांच लोगों का एक जगह इकट्ठा होना जुर्म था। महाराष्ट्र में लोगों ने ब्रिटिश शासन के दौरान बहुत साहस और राष्ट्रवादी उत्साह के साथ अंग्रेजों के क्रूर व्यवहार से मुक्त होने के लिए गणेशोत्सव मनाना शुरु किया था। सार्वजनिक तौर पर गणेशोत्सव और विसर्जन की रस्म लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा धारा 144 के विरोध में समाज को एकजुट करने के लिए स्थापित की गई थी। धीरे.धीरे लोगों द्वारा यह उत्सव परिवार के समारोह के बजाय समुदाय की भागीदारी के माध्यम से मनाना शुरू किया गया था। अब गणेशोत्सव सिर्फ महाराष्ट्र की ही विरासत भर नही वरन देश की पहचान बनता जा रहा है। अब तो इसे दुनियाभर में सनातन की पहचान के तौर पर मनाया जाने लगा है।
ध्यान देगे तो समझेगे कि इस उसके उलट आज गणेश उत्सव के पण्डाल एक दूसरे के प्रतिस्पर्धात्मक हो चले हैं। गणेशोत्सव में समाजिक एकता, अखंडता और सौहार्द की प्रेरणाएं कोसों दूर होती जा रही हैं और इसको मनाने वालों में एकता नाम मात्र की ही रह गई है। इस बार हमें एक बार फिर से संगठित होकर गणेशोत्सव को इतनी ख़ुशी व धूमधाम से मनाना चाहिए जिससे समाज में एकता व भाईचारा बढ़ सके।
पिछले तीन-चार दशकों में गणेशोत्सव काफी हद तक अपने मुल मकसद से भटक चुका है। अब पंडालों में एक दूसरे से अलग-थलग दिखने की प्रतियोगिता होती है। गणेशोत्सव के दौरान भगवान गणेश के आगमन और विसर्जन के दौरान खूब पटाखे छोडे जाते है,खूब जोरशोर से ढोल नगाडे बजाये जाते है। शांती की जगह शोर ने ले ली है, वह तो शुक्र है कि धार्मिक श्रद्धा की वजह से इस ओर ध्यान नही जाता वैसे सिर्फ गणेशोत्सव की ही क्या बात करू, गौरतलब है कि सभी धार्मिक त्योहारों के सामाजिक कुरितीयां अनियंत्रित हो गई है। अब तो यह सभी धर्मों के त्योहारों में आसानी से दिखाई देने भी लगा है। इस से गणेशोत्सव भी नही बचा है।
एक बात ध्यान देने की है कि गणेश पडालों के आपसी प्रतियोगितात्मक रवैए ने सामाजिक विकास को अवरूद्ध किया है। सामाजिक विसमता को उलटा बढावा ही दिया है। क्षेत्रवाद को बल दिया है। महाराष्ट्र में गणेशोत्सव दस दिन मनाया जाता है। अधिकांश इलाकों में स्थानीय लोग रतजगा करते है। स्थानीय असामाजिक तबका इन पंडालों में रात रात भर जाग कर हुडदंग मचाये रहते है।
गणेशोत्सव में सार्वजनिक पंडालों की बात करू तो अब इनमें दिखावा बहुत होता है। एक दूसरे से आगे निकलने की होड में पंडालों पर बेतहाशा रूपये खर्च कर बहुत ही भव्य बनाये जाते है, चमक-दमक का प्रदर्शन होता है। यह जरूर है ऐसे पंडाल खूबसूरत तो बहुत दिखते है लेकिन दान के रूपयों का सदुपयोग नही हो पाता। होना यह चाहिए कि इन रूपयों से जरूर मंद लोगो की मदद होनी चाहिए। गरीब और गुरबत में जी रहे बच्चो की शिक्षा दीक्षा पर खर्च होना चाहिए। आत्मिक आनंद और सुख के लिए भजन-कीर्तन और सत्संग का आयोजन होना चाहिए। गरीबों और भूखों को भर पेट भोजन मिल सके,इसलिए भंडारे किये जाने चाहिए। भजन सत्संग से पंडाल और आप पास के इलाकों का आध्यात्मिक दर्शन लाभ होगा, मन को शांती और समाज को सम्मान मिलेगा और हिदुत्व को बल मिलेगा। लोगों में हिदुत्व के प्रति सकारात्मक आस्था का निर्माण होगा,जिससे सनातन धर्म का प्रभाव बढेगा,ताकत बढेगी।
गणेशोत्सव एक धार्मिक त्योहार है,इस दौरान ऐसा नही किया जाना चाहिए लेकिन आजकल यही हो रहा है। धर्म के नाम पर सार्वजनिक त्योहारों में हुडदंग और हुल्लड़बाजी आम है। गणेशोत्सव में भगवान गणेश के आगमन और विसर्जन के समय बड़े आकार के डिजे बजाये जाते है। बेमतलब के शोर गुल से आसपास का वातावरण कर्कश बन जाता है। विज्ञान की नियमावली केञअनुसार कहूं तो आम जनमानस के स्वभाव में बेचैनी पनपने लगती है। सुखद नीद का हनन होता है। श्रीमुर्ती आगमन और विसर्जन के दौरान अश्लील गाने बजाये जाते है, इन्ही कानफाडू अश्लील और द्विअर्थी गीतों पर युवक-युवतिया झूम झूम कर नृत्य का प्रदर्शन करते है। देखने में यह फूहड और भद्दा लगता है, हृदय को अस्वीकार्य होता है पर मजबूरी वश बर्दाश्त करना पडता है। जबकि ऐसे माहोल में दिल को सूकून और शांती प्रदान करने वाले भजन-कीर्तन बजने चाहिए। खांटी देशी,जमीनी संगीत के साथ भारतीय फिल्मी भजन भी बहुत लोकप्रिय है,इनका भी प्रयोग कर सकते है। जो कम से कम दिल और दिमाग को आराम के साथ आनंद देगा।
एक वक्त था,ईष्ट देव दर्शन की कतार में भीडभाड का फायदा उठा कर असामाजिक तत्व गलत हरकतें करते थे,इसी बात को ध्यान में रखते हुए आजकल पंडालों में महिला-पुरुष के कतार अलग-अलग होते है। महिलायें अपने को सुरक्षित महसूस करती है। इस वजह से आजकल महिला दर्शानार्थियो की तादात में इजाफा हुआ है।
इस विषय में  समाज काफी हद तक जागरूक हुआ है। इस ओर समाज के विवेकशील समूह का ध्यान भी गया है,समाज सुधार में उल्लेखनीय प्रगति हुई है जो पहले जानबूझकर नजरअंदाज कर दिया जाता था।


गणेशोत्सव में गणेश पंडालों को जितना तडक भडक और भव्य रूप देगे,पैसे की बर्बादी उतनी ही ज्यादा होगी,जितनी सादगी से हम गणेशोत्सव मनाएंगे, उतना ही हमारा उत्साह वर्धन होगा और दान के रूपयो का सदुपयोग बढेगा। धर्म,समाज, संस्कृती के विकास व जतन के लिए हम रूपयो का सही और समृद्ध उपयोग कर पायेगे। हमे धार्मिक त्योहार सादगी से मनाने चाहिए, कहते है ना,सादा जीवन, उच्च विचार बिल्कुल यही होना भी चाहिए।
एक वक्त समाज का कामचोर और गैरजिम्मेदार धार्मिक तबका मतलब धार्मिक समाज के अधिकांश सुशिक्षित, समझदार और सांस्कृतिक लोग सार्वजनिक समारोहों को आयोजित से परहेज करते थे, घर में परिवार के साथ सिमित दायरे में दूबके रहते थे। जबकि ऐसा होना नही चाहिए था,अपने धर्म, समाज और संस्कृती के लिए इनकी भी जिम्मेदारी होती है लेकिन यह पहले आगे नही आता था लेकिन राष्ट्रवाद की हवा ने अब इनको भी जागरूक बना दिया है। अब यह समूह भी आगे आकर सेवा भाव दिखाने लगा है। बढ चढ कर हिस्सा लेने लगा है। अपने धार्मिक कर्तव्यों के प्रति जागरूक हुआ है,समझदार और साकारात्मक हुआ है।
आज समाज का यही जिम्मेदार समूह धर्म बचाने के लिए आगे आ रहा है। सार्वजनिक समारोह में परोक्ष और अपरोक्ष रूप से राजनीतिक दलों का भी समर्थन होता है। अपने फायदे के लिए कुछ तो व्यक्तिगत रूप से रूचि दिखाते है लेकिन मुझे लगता है,धार्मिक त्योहारों और महोत्सवों से राजनीति को दूर रखना चाहिए, उनकी कारगुजारियों से परहेज करना चाहिए।
मैं सिर्फ गणेशोत्सव की ही बात नही कर रहा हूँ। गणेशोत्सव सार्वजनिक धार्मिक समारोह अपने मुल एकता,अखंडता,शांती,सदभाव और बंधुत्व के अपने मुल मुद्दे से भटक चुके है। इन सार्वजनिक समारोहों में जागरूक और समझदार तबके के परहेज की वजह से राजनीतिक असामाजिक तत्वों का एकाधिकार और कब्जा हो गया है। इस विषय में लोगो को जागरूक करना बहुत महत्वपूर्ण हो गया है।
एक बात की जरूर खुशी है कि जबसे देश में राष्ट्रवाद की लहर पैदा हुई है तब से देश का सनातनी समाज जागरूक और नियंत्रित हुआ है। असामाजिक और अधार्मिक कार्यो पर काबू करने का भरसक प्रयास कर रहा है। भारतीय सनातनी समाज जिम्मेदार हुआ है,समझदार हुआ है। धार्मिक सुधारों और देश के विकास में बढ-चढ कर हिस्सा ले रहा है।

            डाॅ धीरज फूलमती सिंह
                 (वरिष्ठ स्तंभकार)

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