मन में जो है बात वो भैया जल्दी से तुम बोल दो!
कहीं देर ना हो जाए तुम रिश्तो को भी मोल दो!!
छोटी-छोटी बातें देखो कितनी जल्दी बढ़ जाती हैं!
जैसे चिंगारी से ज्वाला कितनी जल्दी बन जाती है!!
लग जाती है जब एक लपट रिश्तो को फिर वह ना पनपे!
मुरझा जाते हैं फिर चेहरे जब ना मिलता, सब कुछ करके!!
जब जीवन में पछतावा ही रह जाता है साया बनकर!
अब किससे कहूं और कैसे कहूं यह प्रश्न ही आते हैं बनकर!!
इस छोटे से जीवन में तुम रिश्तो की सीमा को समझो!
अपने ही मन की बात सुनो लोगों की बातें ना समझो!!
लेखक अभिषेक त्रिपाठी


