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कविता

निगाहों से निगाहों की अगर तकरार हो जाये,

यकीनन तीर नज़रों का जिगर से पार हो जाये,,

तेरी ये झील सी आंखें हमें लगती बड़ी गहरी,

गये है डूब कितने चाह लो हम पार हो जाये,,

गली से रोज गुजरूँ मैं यही तो सोच कर के अब,

कहीं खिड़की से निकले चाँद तो दीदार हो जाये,,

गढ़ी गजलें कहे है गीत कितने छन्द तेरे खातिर,

कहीं तू सुन ले तो मुझ से तुझे भी प्यार हो जाये,,

अधूरी ख्वाहिशें कितनी पड़ी दिल के घरौंदे में,

पलट के देख ले गर तू के बस इकरार हो जाय,,

आनंद पाण्डेय “केवल”

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