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कविता

छोड़ देना कुछ दिनों का साथ साथियों !

ना मिलो और ना मिलाना हाथ साथियों!!

कर रही है अद्भुत प्रयास सरकारे! फिर भी मुसीबत में कितने बेचारे!!

बढ़ रहा है देखो विषाणु साथियों !

ना मिलो ना मिला ना हाथ साथियों!!

देश में फैली बीमारी महामारी बन गई !

तन भी डूबा धन भी डूबा भुखमरी अब बढ़ रही !

देश से कर लो यह वादा फिर से साथियों !

घर में ही रहकर करो अब काम साथियों !

ना मिलो और ना मिलाना हाथ साथियों!!

देश के उज्ज्वल कदम जब सत्ता में भी बढ़ गए !

दिख रही रोशन सी दुनिया कामयाबी बढ़ रही !

बन रहा मेरा देश अब मिसाल साथियों !

ना मिलो और ना मिलाना हाथ साथियों !!

देश को डिजिटल बना कर काम तूने जो किया !

पूर्व पश्चिम उत्तर दक्षिण नाम तूने कर दिया!

पड़ गई उसकी जरूरत अब घर में साथियों !

पड़ गई उसकी जरूरत आज साथियों !

ना मिलो और ना मिलाना हाथ साथियों!!

खूबसूरत है धरा और बढ़ रहा सौंदर्य अब!

हो गया है गगन नीला छठ गई है धुंध सब !

बदला लेकर प्रकृति ने जो कुछ दिनों की दी सजा !

देश की हालत हुयी ये और बनी है ये वजह!

झुक के माफी मांग लो एक बार साथियों !!

प्रकृति से माफी मांग लो एक बार साथियों !!

ना मिलो और ना मिलाना हाथ साथियों

                        गीतकार-अभिषेक त्रिपाठी

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