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प्रदूषण का गहराता घातक जाल

प्रदूषण विनाश की ओर बढ़ता हुआ एक ऐसा राक्षस है जो दिन पर दिन देश की जनता को बीमार किए दे रहा है । प्रदूषण की शुरुआत पराली जलाने से बेशक होती हो लेकिन धीरे-धीरे उसमें अन्य कारक भी अपना योगदान देने लगते हैं। पिछले कुछ दशकों से पराली जल रही है लेकिन सरकार पराली जलाने को प्रदूषण का कारण नहीं मानती थी लेकिन अब सरकारें इसके लिए सजग हुई हैं परंतु उनकी सजगता कारगर नहीं हो रही, इसका कारण कार्य सिर्फ कागजों में हो रहा है जमीनी स्तर पर नहीं।
प्रदूषण से हानिकारक गैसें उत्सर्जित होती हैं जिसके चलते जलवायु परिवर्तन तेज होता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन से गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। आने वाले समय में फसल पर भी इसका प्रभाव अवश्य पड़ेगा। वर्तमान में भी यह देखा जा रहा है।

पर्यावरण प्रदूषित होने से स्वास्थ्य खराब हो जाता है ,मानव अनेक बीमारी से ग्रसित होता है । जिस तरह सिगरेट का धुआं स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है उसी तरह कोई भी धुँआ हो, वह हानिकारक है ..चाहे वह पराली का हो या कंडो का । पराली जलाने वाले किसान प्रदूषण की विभीषिका को अपनी समस्या नहीं मानते, उन्हें पराली से होने वाले नुकसान की चिंता नहीं होती और न ही गिरते भूजल स्तर की।
प्रदूषण एक ऐसी समस्या है जिसका समाधान तभी संभव है जब सरकार को जनता का सहयोग मिलेगा । उत्तर भारत में पराली का धुआं प्रदूषण का एक बड़ा कारक अवश्य है लेकिन उसके साथ ही वाहनों का उत्सर्जन ,सड़कों और निर्माण स्थलों से उड़ने वाली धूल, कारखाने से निकलने वाला धुआं आदि भी प्रदूषण को बढ़ावा देते हैं । जब भी प्रदूषण का जिक्र होता है तो सर्वप्रथम पराली ही सबके मस्तिष्क में घूमने लगती है लेकिन वाहनों से निकलने वाले धुंए ,कारखानों से निकलने वाले धुंए की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। इसी कारण प्रदूषण पर लगाम नहीं लग पाती। अगर यह सोचा जा रहा है कि पराली को कैसे रोका जाए तो वाहनों के कल -कारखानों के धुंए को भी रोकना होगा ।
प्रदूषण को रोकने के लिए जिन इंजीनियरों और नीतिनियंताओं को जिम्मेदारी दी गई है कि वे शहरों के अंदर आधारभूत ढांचे को अधिक बेहतर बनाएं । उन्हें सजग रहकर काम करना होगा, वैज्ञानिक तरीके अपनाकर प्रदूषण पर लगाम लगानी होगी, और साथ ही साथ शहरों में आधारभूत ढांचे के निर्माण को बदलना होगा। अभी भी पुरानी तकनीक पर निर्माण कार्य हो रहा है जिससे प्रदूषण में बढ़ोतरी हो रही है। मोदी जी के प्रयास जनता विफल कर रही है । आम नागरिक प्रदूषण निवारण के लिए पूरी तरह सरकार पर निर्भर है। अगर प्रदूषण के घातक जाल से बचना है तो सरकार और जनता दोनों को अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभानी होगी।
इसी प्रकार से स्थानीय स्तर पर होने वाले नवाचार पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है जैसे एक स्टार्टअप ने अब फसल अवशेषों से इको फ्रेंडली कप और प्लेट जैसे उत्पादन बनाने की पद्धति विकसित की थी उन्हें प्रोत्साहन देकर आगे लाने की आवश्यकता है ।
धुआं चाहे कैसा भी हो है तो धुंआ तो धुआं ही है। पराली का हो या शहरों में उड़ती धूल का अब समय आ गया है सतर्क और सजग रहने का …लगाम लगाने का..तो आइए आज से ही संकल्प लें और एकजुट हो जाएं कि प्रदूषण नहीं करेंगे और न प्रदूषण करने वाले कारक अपने आस-पास होने देंगे ।

नन्दिनी रस्तोगी ‘नेहा’
मेरठ

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