अखबारी जगत के कुछ आयोजनों और सोशल मीडिया की रस्म अदायगी को छोड़ दें तो यह प्रश्न चिरंतन बना ही हुआ है कि क्या किताबें और लाइब्रेरियांं फैशन से बाहर हो गई हैं? क्या हमने पढऩा छोड़ दिया है? किताबों का भविष्य क्या है …?

विमल मिश्र
सुंदराबाई हॉल में हुए इस बुक फेयर का न सिर्फ अपना किड जोन था, बल्कि रोबोटिक्स जैसी वर्कशॉपों के साथ क्विज, पेंटिंग, आर्ट और क्राफ्ट पर वर्कशॉप्स की भी कमी नहीं थी। कलाकारों, लेखक-कवियों, थियेटर, फिल्मी हस्तियों व लोक कलाकारों ने उसे साहित्यिक व सांस्कृतिक उत्सव बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, तब भी पढ़ाकुओं ने बुक फेयर की ओर रुख नहीं किया। न बताने लायक साहित्यिक-पत्रकारीय आयोजन और कांपिटिशन हुए, न हैवी डिस्काउंट ऑफर्स के लिए किसी ने पूछा। गर्मी की छुट्टियों में भरी रहने वाली लाइब्रेरियां, रीडिंग्स रूम व किताबों की दुकानें अब भी सूनी हैं और सेकंड हैंड बुक्स के दुकानदार फुटपाथों पर किताबें बिछाए बोहनी का इंतजार कर रहे हैं।
पेशे से पत्रकार सुधाकर के जेहन में बनारस की वह लाइब्रेरी अभी भी बसी है, जिसके वे पीढ़ियों से मेंबर थेग़ ‘लाइब्रेरियन से हमारे पारिवारिक संबंध होते थे। चुंबक-सी छुअन, सम्मोहन-सी महक, पन्ने बदलते समय उनकी फडफड़ाहट-किताबों का फील ही अलग था।’ मुलुंड की इंदु शर्मा को इंदौर के दिन याद आ गए, ‘धर्मयुग’, ‘पराग’, ‘नंदन’, ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’, ‘कादंबिनी’, ‘नवनीत’ हमारे घर में कौन-सी मैगजीन नहीं आती थी? विडंबना देखिए, जिन्होंने पढऩे का शौक पैदा किया वे कई मैगजीनें आज खुद इतिहास बन गई हैं। एशिया की सबसे बड़ी स्पोर्ट्स लाइब्रेरी की दुर्दशा का हाल आपने अखबारों में पढ़ा ही-यह हालत तकरीबन हर जगह है। टाउन हॉल के पास सेंट्रल लाइब्रेरी के पाठक घटे हैं, काला घोड़ा की प्रसिद्ध डेविड ससून जैसी लाइब्रेरियों की कुर्सियां सूनी रहने लगी हैं। और तो और, लॉयल पाठकों के लिए मशहूर दादर का मुंबई मराठी संग्रहालय भी युवा पाठकों के बेगाने व्यवहार की शिकायतें करने लगा है। सर्कुलेटिंग लाइब्रेरियों पर या ताले लग गए हैं, या गुजारे के लिए उन्हें ‘ऑन लाइन’ होना पड़ा है। ए. एच. व्हीलर जैसी जानी-मानी बुक चेन्स गुजारे के लिए स्टेशनरी, खिलौने और सीडी-डीवीडी की सेल के मोहताज हैं। रेलवे स्टॉलों पर सुरेंद्र मोहन पाठक अभी भी बेस्ट सेलर हैं, पर फुटपाथों पर बिकने वाले क्लासिक लिटरेचर के गुणग्राहक दुर्लभ हो गए हैं। लोकल ट्रेनों में वर्ग पहेलियों में उलझे पाठक खत्म हो गए हैं। दैनिक अखबारों की रीडरशिप ऐसे वक्त गिरने लगी है, जब साक्षरता दर लगातार बढ़ रही है। उनके नियमित पाठकों भी सोशल मीडिया पर ही अखबार पढ़ने की चाट लग गई है।
मुंबई के हिंदी पाठकों की हालत कोई अलग नहीं। सीपी टैंक स्थित हिंदी किताबों के सौ वर्ष पुराने प्रकाशन हिंदी ग्रंथ रत्नाकर के मनीष मोदी ने बताया, ‘1990 में केबिल टीवी से शुरू होकर आज के इंटरनेट युग तक-मनबहलाव के नए साधनों के बीच रीडिंग हैबिट ने सिर्फ गिरावट ही देखी है।’ उन्होंने समझाया, ‘आज जो पेरंट्स हैं उनमें भी ज्यादातर ने इंग्लिश मीडियम से ही शिक्षा हासिल की है। … उनमें फिर भी हिंदी के लिए इमोशनल फीलिंग्ज हो सकती हैं, पर उनके नौनिहालों से यह उम्मीद रखना ठीक नहीं। उनकी तो सोच की भाषा ही इंग्लिश है!’
‘माध्यम बदला है, पढऩे की आदत नहीं।’ एक प्रकाशक ने बताया, ‘खासकर, नई पीढ़ी का युवक,. वह पदंदीदा विषय ही सही, पर खरीदकर पढ़ रहा है।’ उनकी शिकायत थी, ‘महंगा होना एक मुद्दा है, पर एक बड़ी आबादी को किताबें मिल ही नहीं पा रही हैं, क्योंकि देश के बड़े इलाकों में 200 किलोमीटर की परिधि में किताबों की दुकानें हैं ही नहीं। एक अन्य प्रकाशक ने हिंदी अखबारों की भूमिका पर सवाल उठाया, ‘पाठकों को आखिर यह जानकारी कौन देगा कि कौन-सी किताबें पढ़ी जाने लायक हैं? अखबार और पत्रिकाएं किताबों के कॉलम छापते ही नहीं हैं!’
पाठकों की उदासीनता के इस घटाटोप में भी लेखिका सुधा अरोड़ा निराश नहीं। किताबें लौटेंगी इसके पीछे उनका अलग ही तर्क है, ‘ई-बुक, टैब्लेट, किंडल, लैपटॉप, स्मार्ट फोंस जैसे माध्यमों का यूज करने वाले युवा रीडर कलाई, आंखों और पीठ की कई तरह के रोगों का आदी बन रहे हैं। … किताबें दिमाग की खुराक हैं। यह ताकत दूसरे माध्यमों में कहां?’
क्या पढ़ते हैं मुंबईकर?
बच्चे: कैरेक्टर बेस्ड स्टोरी बुक्स और कॉमिक्स।
युवा वर्ग: मोटिवेशन और सेल्फ हेल्प बुक्स। ज्योतिष, आध्यात्म, वास्तु।
महिलाएं: नॉवेल्स, फिक्शन (खासकर लव स्टोरी), कुकरी।
प्रौढ़ और सीनियर सिटिजन: साहित्य और जीवनी।
कुछ सार्थक प्रयास
महाराष्ट्र में महाबलेश्वर-पंचगनी के पास भिलार गांव ‘पुस्तकांचं गांव’ का नाम सबने सुना होगा – भारत का पहला ‘पुस्तक-गांव’। सातारा के हेकालवाडी जैसे गांवों के लगभग 200 स्कूलों में टाटा ट्रस्ट की पहल ‘पराग’ के अंतर्गत छोटे-छोटे पुस्तकालय कायम कर नन्हें बच्चों में पढ़ने की आदत पैदा की जा रही है। इसी उद्देश्य से ग्रामीण बच्चों के लिए मुंबई और पुणे के कॉलेज छात्रों ने ‘एकलव्य’ नाम से ‘एक गांव, एक लाइब्रेरी’ नामक कार्यक्रम शुरू किया है। के गिरणगांव में मुंबई की पहली उद्यान लाइब्रेरी है और मलबार हिल में बस के रूप में भी एक चलता फिरता पुस्तकालय। आल्टरनेटिव रीयलिटीज’ जैसी संस्थाएं फुटपाथों पर ‘होमलेस लाइब्रेरी’ कायम कर बेघर लोगों में पढ़ने की आदत पैदा कर रही हैं। विरार के नेशनल इंग्लिश स्कूल में कला शिक्षक जयंत सोमन ने पालघर के महागांव स्थित अपने पैत्रिक घर के पार्किंग लॉट को लाइब्रेरी में बदल डाला है। परेल ‘दक्कन क्वीन’ और ‘पंचवटी एक्सप्रेस’ सरीखी ट्रेनों की अपनी मूविंग लाइब्रेरियां हैं। शिवडी के टी. बी. अस्पताल में आप मरीजों की सिरहाने दवाओं के साथ उनकी पनपसंद किताबें भी देख लेंगे।
ऐसी और भी कई पहले हैं। वसई के मराठी भाषी सात पाठकों का ग्रुप एक ही लाइब्रेरी के सदस्य हैं। हर महीने वे सब एक साथ यहां की एक दुकान से अपनी पसंद की एक-एक किताब खरीदने आते हैं, जिन्हें सभी मिलकर पढ़ते हैं। यह मित्र मंडली बहुभाषा-भाषी है। मलयालीभाषी जहां हिंदी किताबें खरीदता है, वहीं हिंदी भाषी मराठी और बांग्ला की। कई लाइब्रेरियां पाठकों की व्यस्तता को देखते हुए मूविंग हो गई हैं। ‘नंबर वन लेडीज़ कूल क्लब’ की मेंबर्स-जिनमें जर्नलिस्ट कैरोल एंड्राडे, शशि बालिगा व दीपा गहलोत, रॉयटर रूपा पटेल, ब्रिटिश हाई कमीशन की ऑफिसर शिरीन मिस्त्री, पूर्व पुलिस ऑफिसर कंचन भट्टाचार्य और उद्योगपति नियोमी खटाऊ शामिल हैं-बारी-बारी किसी एक के घर में मिला करती हैं। विभा कामत की बांद्रा स्थित एम क्यूब्ड लाइब्रेरी हर महीने नन्हे-मुन्नों को बुलाकर किसी किताब पर चर्चा करती है। बच्चों में ‘क्रिएटिव रीडिंग’ डिवेलप करने का यही काम चाइल्ड साइक्लाजिस्ट और पेरेंट काउंसुलर रूपल मेहता का इसी नाम का रीडिंग क्लब भी कर रहा है। लुप्त हो रही रीडिंग हैबिट को वापस लौटाने में मानवजी सहज का ‘रीड इंडिया, रीड’ संगठन और ‘रूम टु रीड’ जैसी विदेशी संस्थाएं भी जुटी हैं। नेरूल की एक बुक का नाम ही ‘रीडिंग हैबिट्स’ है।
बच्चों में ऐसे बढ़ाएं रीडिंग हैबिट
1. किसी लाइब्रेरी का मेंबर बन जाएं। बच्चे के साथ वहां के रीडिंग रूम में वक्त बिताएं। वहां से घर किताब लाएं और बच्चे को बता दें कि उसे तय मियाद में ही पढ़कर रिटर्न करना है।
2. खुद भी दिलचस्पी लेकर पढ़ें। खासकर, तब जब आपके बच्चे के हाथ में भी कोई किताब हो।
3. पढऩे के लिए दबाव न डालें। बच्चों को उनकी स्पीड से पढऩे दें।
4. किताबों को घर के एक शेल्फ या जगह तक सीमित न रखें। टीवी और बेडसाइट टेबल के पास छितरा दें। खासकर बच्चों के अपने रूम में।5. बच्चा छोटा हो तो पिक्चर वाली किताब लेकर उसके पात्रों व घटनाओं के बारे में उसके साथ चर्चा करें। बारी-बारी, जोर-जोर से पढ़े। इससे बच्चे की बोलने की क्षमता भी बढ़ेगी।
6. बच्चा कोई बुक पूरी कर ले तो उसे टोकेन गिफ्ट दे सकते हैं। चाहें तो बच्चे से उसका सार भी लिखवाएं। यह उसकी रायटिंग स्किल को बढ़ाएगी।
7. टीवी की तरह पढऩे का वक्त भी मुकर्रर हो, जब घर का हर सदस्य कुछ-न-कुछ जरूर पढ़े। इस वक्त को आहिस्ता-आहिस्ता बढ़ाएं। दोपहर इसके लिए सबसे अच्छा वक्त है।


