spot_img
Homeसंपादकीयगांव बनते शहर

गांव बनते शहर

भारत को गांवों का देश कहा गया है। देश की 60 प्रतिशत जनता गांवों में रहती है। मगर भारत के गांवों का अब तेजी से शहरीकरण हो रहा है। इस प्रोसेस को समझने के लिए सरकार अब एक नई कैटेगिरी पर विचार कर रही है। इसे ‘फंक्शनल अर्बन सेटलमेंट्स’ का दर्जा मिल सकता है। शहरों और कस्बों के अलावा अब गांवों में भी शहरों जैसी सुविधाएं आती जा रही हैं। जैसे ज्यादा बिल्डअप एरिया, रोजी-रोटी के लिए खेती पर कम होती निर्भरता और तेज रफ्तार ट्रांसपोर्ट नेटवर्क। इसे देखते हुए सरकार मौजूदा ‘ग्रामीण’ और ‘शहरी’ वर्गीकरण के अलावा एक नई कैटेगरी बनाने पर विचार कर रही है। इसे ‘फंक्शनल अर्बन सेटलमेंट्स’ (कार्यात्मक शहरी बस्तियां) बनाने पर विचार चल रहा है। कई गांव अब शहर जैसे लगने लगे हैं। संयुक्त राष्ट्र के शहरीकरण ढांचे की डिग्री पर आधारित एक अनुमान से पता चलता है कि 2025 में भारत की लगभग 84% आबादी शहरी बस्तियों में रहती थी, जो सरकार के 36% के अनुमान से कहीं अधिक है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वर्तमान में, शहरीकरण की रूपरेखा दो श्रेणियों के अंतर्गत आती है। जनगणना पर आधारित शहर (5,000 से अधिक आबादी) और वैधानिक शहर (नगरपालिका संस्थाओं के साथ)। हालांकि, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, केरल या मध्य प्रदेश में शहरी क्षेत्रों के करीब कुछ गांवों का दौरा करने से पता चलेगा कि इनमें सबसे अधिक ‘शहरी’ विशेषताएं हैं। शहरी परिदृश्य को समझना उद्देश्य है इनका। आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के तहत ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स’ की हालिया स्टडी में ‘फंक्शनल अर्बन सेटलमेंट्स’ (कार्यात्मक शहरी बस्तियां) नाम के नए नेशनल सेटलमेंट क्लासिफिकेशन फ्रेमवर्क की सिफारिश की गई है। इसका मकसद देश के तेजी से बदलते शहरी परिदृश्य को सही ढंग से समझना है, क्योंकि शहरीकरण का एक बड़ा हिस्सा आधिकारिक तौर पर मान्यता प्राप्त कस्बों और शहरों के बाहर हो रहा है। इस स्टडी को प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव पीके मिश्रा ने जारी किया। मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि ऐसे कई क्षेत्र हैं, जो शहरी सुविधाओं को प्रदर्शित करते हैं लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों के रूप में उनका शासन हो रहा है। इससे शहरीकरण के भूगोल और शासन संरचनाओं के बीच महत्वपूर्ण अंतर पैदा होता है। सरकार ने पिछले बजट में सिटी इकोनॉमिक रीजन्स के लिए आर्थिक मदद का भी ऐलान किया है। ये रीजन्स सख्त प्रशासनिक सीमाओं से परे होते हैं और रणनीतिक आर्थिक केंद्रों के तौर पर काम करने के लिए इंटीग्रेटेड सप्लाई चेन, लेबर मार्केट और आस-पास के कस्बों को जोड़ते हैं। स्टडी ने केरल और मध्य प्रदेश में अपने मॉडिफाइड ‘डिग्री ऑफ अर्बनाइजेशन’ फ्रेमवर्क का इस्तेमाल करके, मौजूदा वैधानिक और जनगणना कस्बों की व्यवस्था से बाहर सैकड़ों फंक्शनल शहरी बस्तियों की पहचान की है। केरल में, 2025 में वैधानिक कस्बों (स्टैच्यूटरी टाउन) की संख्या 63 से बढ़कर 93 हो गई है। वहीं, ट्रांजिशन मैट्रिक्स से पता चलता है कि 2011 में पहचाने गए 461 जनगणना कस्बों (सेंसस टाउन) में से 77 को नगर पालिकाओं में अपग्रेड किया गया और 102 गांवों को शहरी स्थानीय निकायों में शामिल किया गया। यह केरल में फैले हुए शहरीकरण और शहरी प्रशासन के बढ़ते नेटवर्क को दर्शाता है। प्रशासनिक सीमाओं या आबादी के आधार पर तय किए जाने वाले तरीकों के उलट, इस नए मैट्रिक्स में सैटेलाइट सेंसर से ली गई रोशनी वाली जगहों की लोकेशन और चमक के आधार पर शहर के फैलाव का पता लगाने के लिए ‘नाइट-टाइम लाइट’ तरीकों का इस्तेमाल किया गया है। मंत्रालय साथ ही टियर-2, 3, 4 और 5 शहरों के लिए एक जैसा वर्गीकरण भी फाइनल कर रहा है, ताकि शहरी केंद्रों के आकार और भूमिका के आधार पर अलग-अलग पॉलिसी, इन्वेस्टमेंट और प्लानिंग बनाई जा सके। इसमें आबादी के आधार पर टियर-1 शहरों को तीन कैटेगरी में बांटने का प्रस्ताव भी है।

RELATED ARTICLES

Most Popular

WP2Social Auto Publish Powered By : XYZScripts.com