नज़्म (ग़ज़ल)
फिर किसी ने राग छेड़ा
जाग गया दर्द थोड़ा-थोड़ा।।
तोड़कर के बांध अश्रु
बह गये फिर थोड़ा-थोड़ा।।
टीस भी बढ़ने लगी और
सांस रोई थोड़ा-थोड़ा ।।
मैं कुटज बन सहती रही
मार मौसमी थोड़ा-थोड़ा।।
फेहरिस्त बढ़ने लगी क्यूँ
अब रिश्तों कीथोड़ा-थोड़ा।।
रख हथेली पे नमक बस
छिड़का सभी ने थोड़ा-थोड़ा।।
छंट गयी हाय धुंध सारी
रोया आसमां थोड़ा-थोड़ा।।
… सविता वर्मा


