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नज़्म

नज़्म (ग़ज़ल)

 

फिर किसी ने राग छेड़ा

जाग गया दर्द थोड़ा-थोड़ा।।

 

तोड़कर के बांध अश्रु

बह गये फिर थोड़ा-थोड़ा।।

 

टीस भी बढ़ने लगी और

सांस रोई थोड़ा-थोड़ा ।।

 

मैं कुटज बन सहती रही

मार मौसमी थोड़ा-थोड़ा।।

 

फेहरिस्त बढ़ने लगी क्यूँ

अब रिश्तों कीथोड़ा-थोड़ा।।

 

रख हथेली पे नमक बस

छिड़का सभी ने थोड़ा-थोड़ा।।

 

छंट गयी हाय धुंध सारी

रोया आसमां थोड़ा-थोड़ा।।

 

… सविता वर्मा

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