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भोजपुरी गीतों की खुशबू से भरपूर ‘चुभे लागल बरगद के छांव’ 

राजेश विक्रांत 

साहित्यकार व व्यंग्यकार

हिंदी और भोजपुरी के सुप्रसिद्ध कवि, ग़ज़लकार, गीतकार व कथाकार लाल बहादुर चौरसिया लाल की पुस्तक ‘चुभे लागल बरगद के छांव’ भोजपुरी गीत संग्रह है। पुस्तक में कुल 99 गीत हैं और ज्यादातर प्रकृति, रीति- रिवाज, परंपरा, पर्यावरण, प्यार- मोहब्बत, रिश्ते, परिश्रम, शिक्षा, मौसम, भक्ति, श्रृंगार, संयोग- वियोग के साथ भाषा और जन्मभूमि से संबंधित गीत इस पुस्तक में हैं।

कवि लाल बहादुर चौरसिया लाल भोजपुरी और हिंदी के प्रख्यात साहित्यकार हैं। इससे पहले उनके दो काव्य संग्रह ‘आंसू से मुस्कान लिखेंगे’ तथा ‘मैं मधुमास ढूंढने आया’ प्रकाशित हो चुके हैं तथा आईसीएस सीबीएसई बोर्ड की हिंदी पाठ्यपुस्तक मैथिली और बांसुरी सीरीज में उनकी रचनाएं शामिल हैं।

यह पुस्तक ‘चुभे लागल बरगद के छांव’ को तथागत पांडुलिपि प्रकाशन योजना 2026 के तहत चयनित व प्रकाशित किया गया है। इसके प्रकाशक भोजपुरी प्रकाशन, नई दिल्ली हैं। 126 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य 210 रुपए है। ‘चुभे लागल बरगद के छांव’ की सभी कविताएं एक से बढ़कर एक हैं। कवि लाल ने इन गेय कविताओं के जरिए भोजपुरी माटी की सुगंध बिखेरी है। उनका एक गीत लाल कहाइब’ यूं है-गड़ही, पोखरा ताल कहाइब। काव घटी बेहाल कहाइब॥

समय के साथे जूझत बाटी, कहियो माला-माल कहाइब॥

मत देखा ई जेठ लगल हौ, सावन में भौकाल कहाइब॥

लाल की एक अन्य कविता ‘डोले पूरबी बयार’ में प्रकृति की छटा दृष्टव्य है-

डोले पूरबी बयार डोले पूरबी बयार, फागुन के मस्त महिनवाँ में।

सरसो के फुलवन से महकल सिवनवाँ, चनवाँ फुलायल त चहकल गगनवाँ, खिले फूल कचनार खिले फूल कचनार, फागुन के मस्त महिनवाँ में।

अमुआ के बगिया से पिहुकल कोयलिया, चहु ओर गूँजल बा फागुन कऽ बोलिया, मन झूमे हमार मन झूमे हमार, फागुन के मस्त महिनवाँ में।

कलियन के उपरा बा भँवरा लुभायल, धरती कऽ धानी चुनरिया रंगाइल, सोहे घरवा दुआर सोहे घरवा दुआर फागुन के मस्त महिनवाँ में।।

सँग्रह की कुछ कविताएं जो मुझे बहुत ज्यादा पसंद आई, उनमें से काहे हिंदी के बिसरावल जाला, पसीना, का हो बेटा घोंचू लाल, नेह बांटत रहा, नयके साल में, ओरहन, निहोरा, भोजपुरी कवि सम्मेलन, एगो चंदा बा उतरल, फिर परधानी आइल बा, केहू नईखे बोलत बा, गंध केसर झरे, कठिन काम बा, पछतावा, मोरा गांव, कर जोरि के, झंडा लहरे, सूनी सेजरिया ना, सजली संवरिया, बोला मितवा, बगिया सजइबे, भइली निहाल, सब कुछ लुटाइल, ना कउनो संनेस आइल, कांपे ले बदनियां, आजमगढ़ की भुंइया, मत बेंचा घरवा दुआर तथा दू गो ललनवां।

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