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डाॅ. सुधाकर मिश्र कृत आदिराज पृथु : एक सर्वेक्षण

प्रतिभाविशिष्ट डाॅ. सुधाकर मिश्र हिन्दी के प्रख्यात कवि हैं। ‘आदिराज पृथु’ उनका नवीनतम प्रबन्ध काव्य है। यह छायावाद की अति कल्पनाशीलता, प्रगतिवाद की अति यथार्थपरकता और प्रयोगवाद की अति वैयक्तिकता से पूर्णत: मुक्त एक विशिष्ट काव्य-रचना है। यह गंभीरता में ‘कामायनी’ और चिन्तन में ‘उर्वशी’ की विशेषता और चारुता समाहित किए हुए है। वस्तुत: यह छायावाद और प्रगतिवाद या यों कहें कामायनी और उर्वशी के बीच की रचना है।

ग्यारह सर्गों के इस प्रबंधकाव्य का नाम कथा- वस्तु के बिल्कुल अनुकूल और सार्थक है। यद्यपि भारतवर्ष में पृथु के पहले अनेक राजा हो चुके थे, किन्तु ‘ राजा ‘ शब्द की सार्थकता पृथु के सत्कृत्यों और सुशासन से ही चरितार्थ हुई थी। श्रीमद्भागवत महापुराण में अनेक बार उन्हें ‘आदिराज’ कहा गया है। प्रथम सर्ग को छोड़कर शेष सभी सर्गों में कथावस्तु आदिराज पृथु के ही चारों ओर घूमती है।अत: इसका ‘ आदिराज पृथु’ नाम बिल्कुल उपयुक्त है।

इस काव्य-ग्रंथ के अनुभूति पक्ष और अभिव्यक्ति पक्ष दोनों ही सशक्त और सहृदय हृदय- आह्ललादकारी हैं।

इस प्रबंध काव्य में पात्रों की संख्या बहुत कम है। प्रमुख पात्रों में राजा वेन, दस्यु-सुता, राजर्षि अंग, महारानी देवप्रभा और इस प्रबंध के नायक आदिराज पृथु हैं। पात्रों का चरित्र-चित्रण स्वाभाविक, मनोवैज्ञानिक और यथार्थपरक है। ये पात्र पौराणिक होते हुए भी आधुनिक युग के अनुकूल चित्रित होने के कारण हमारे बीच के प्रतीत होते हैं और प्रासंगिक भी। इनके जीने- रहने के ढंग और सोच- विचार के तौर- तरीके,,इनके अपने समय और आज के भी अनुकूल हैं।

राजा वेन सभी दुर्गुणों से युक्त, अत्याचारी,, विलासी, लंपट ,दंभी और अहंकारी हैं।वे चार्वाक की भाँति नास्तिक (Heterodox), अनीश्वरवादी (Atheist), प्रत्यक्षवादी (Positivist), और सुखवादी (Hedonist) हैं। उनके चरित्र को कवि ने बड़े प्रभावशाली ढंग से चित्रित किया है। स्वयं राजा वेन दर्पोक्ति भरे स्वर में कहते हैं-

१) प्रिये! वही हूँ मैं बैठा सामने तुम्हारे कबसे,

जिसके छू देने से मिट्टी हो जाती है सोना।

जिसकी चरण-धूलि मुकुटों की मुक्ताओं पर हँसती,

याद पराक्रम कर जिसका आता नृपकुल को रोना।

२) इस प्रत्यक्ष ब्रह्म से भी क्या सुन्दर ब्रह्म तुम्हारा?

जिस अदृश्य के दर्शन की चाहना लिए मरती हो।

जिसका पता नहीं है उसके लिए समर्पित जीवन,

जो सजीव, सामने निरादर उस विभु का करती हो।

– सर्ग-१, पृष्ठ- १४

३) वही धर्म है,वीर पुरुष जिसको पसन्द कर लेते,

जो कुछ जँचता नहीं उन्हें है वह अधर्म, अघ भारी।

चक्रपाणि है वह जिसका बल और पराक्रम अन्तिम,

शासन – सूत्र करों में जिसके वही वज्रकरधारी।।

‌‌ – सर्ग-१,पृ.१९

राजा वेन की इस दर्पोक्ति में आज के प्रभुत्व- प्राप्त कुछ लोगों की स्पष्ट झलक दिखती है?

राजा वेन ही के पुत्र आदिराज पृथु हैं, किन्तु वे अपने पिता के ठीक विपरीत चरित्र के महामानव और महाराजा हैं। वे परम पराक्रमी, दयालु, उदार, उदात्त गुण-सम्पन्न, महात्मा, लोकोपकारी और प्रजा-वत्सल शासक हैं। इतना ही नहीं वे दृढ़प्रतिज्ञ, विद्वानों के रक्षक, योगी, चिंतक, सच्चे समर्पित प्रेमी, आदर्श पति, उच्च कोटि के देशभक्त और राष्ट्र- निर्माता भी हैं। उनको जब ऋषियों ने राजा बनाया तो क्या हुआ देखें –

१) आनन्द उमंगित हुआ देश में प्रबल वेग,

खिल गये पुष्प अनगिनत, खिल गया हृदय मंच।

आया सूर्योदय नया,तमस रजनी बीती।

(सर्ग-२,पृ.५०)

२) वर्षा पाकर ज्यों ग्रीष्म तप्त

वसुधा हो जाती है ललाम ‌‌‌‌‌।

पृथु के शासन में उसी तरह

हो गयी प्रजा परिपूर्ण काम।।

सुख, शान्ति, स्नेह की शीतलतम

रसधारा में बह चले लोग।।(सर्ग-३,पृ.५६)

नारी पात्रों में दस्यु – सुता का चरित्र – चित्रण बड़े, मनोयोगपूर्वक किया गया है। वह प्रखर बुद्धि की स्पष्टवादिनी, विचारशील, आस्तिक रमणी है।उसमें आधुनिक नारी की भाँति तर्क- शक्ति और उदात्त प्रज्ञा है।उसके और राजा वेन के बीच हुए संवाद से यह स्पष्ट होता है। उसके कथन में स्वानुभूति की प्रामाणिकता है।वह यथेष्ट सौंदर्य की स्वामिनी है और ईश्वर में विश्वास करती है। नास्तिक और स्वयं को ईश्वर माननेवाले राजा वेन से वह कहती है-

१. पर, ईश्वर की ओर देखने से तुम क्यों डरते हो?

वसुधा के कण-कण में जिसकी ज्योति तरंगें लेती।

चला रहा है जो धरती को,नभ को दिपा रहा है;

जिसकी श्रद्धापुष्ट याद भी मृत को जीवन देती।

‌‌‌‌ ‌‌‌‌‌

२. प्रथम वृष्टि से पुलकित धरती है जो गन्ध लुटाती,

देखा है क्या कभी उसे अपने हाथों में लेकर?

इतराते इतना जिस बल पर उसकी मूर्ति दिखा दो,

कर दो मुझे प्रसन्न प्यार का चित्र कहीं से देकर।

(सर्ग-१, पृ०१७)

आदिराज पृथु की परिणीता देवप्रभा का चरित्रांकन भी बड़ा सजीव और स्वाभाविक है। वह हिमालय के पावन प्रदेश में रहनेवाली यक्ष-कुल की

कन्या है।पहाड़ी प्रदेशों में पायी जानेवाली स्त्रियों के समान वह भी निर्मल चरित्र, मृदु व्यवहार और दृढ़ आस्था- विश्वास वाली नारी है। वह सच्चे अर्थों में आदिराज पृथु की सहधर्मिणी और जीवन- संगिनी है। उसका बाह्य कलेवर उसके हृदय की अनुकृति या प्रतिबिंब जैसा है। कवि ने योग- साधना – रत देवप्रभा का सादृश्यमूलक अलंकारों के प्रयोग से बड़ा ही हृदयहारी चित्र उपस्थित किया है।द्रष्टव्य हैं कुछ पंक्तियाँ :

१. स्वच्छ सरल रेखावत काया, हाथ ध्यान मुद्रा में;

नासिकाग्र पर टिकी दृष्टि सच्चिदानंद निष्ठा से।

वृक्षफाँक से छनकर आती ज्योति, वायु से कंपित,

जिसके मुख पर मँडराती थी प्यासी अलिमाला-सी।

( सर्ग-४, पृ०-८१)

२. एक तरैया आयी नभ से, बैठ गयी धरती पर,

थे औचित्य सुधा में डूबे अंग – तरंग उठाते।

पता नहीं ब्रह्मा ने उसको कैसे गढ़ा, सँवारा,

लगता जैसे दीप जलाकर रखा स्वर्ग ने भूपर।।

( सर्ग- ४, पृ.-८३)

उद्धृत पंक्तियों का बिम्ब-विधान हृदय को आह्लादित कर देता है।

आदिराज पृथु काव्य में प्रेम और सौन्दर्य के मोहक दृश्य उपस्थित किये गये हैं। पुरुष-सौन्दर्य और नारी- सौंदर्य की अभिव्यक्ति के लिए कवि ने ऐसी शब्दावली का उपयोग किया है जो आँखों के सामने सजीव चित्र खड़ा कर देती है।कवि ने राजा वेन के शारीरिक सौष्ठव का उपमा,रूपक, मानवीकरण इत्यादि अलंकारों की सहायता से अत्यंत उर्जस्वित वर्णन किया है –

१.ये शीशम-सी सुगढ़ भुजाएँ, मेरुशिला-सी छाती;

तप्त सुवर्ण स्तंभ के जैसे चरण अतुल बलशाली।

ज्योति-तरंगित नेत्र देख जिनको विद्युत सकुचाती,

उठती है प्रस्वस्थ देह से बाल सूर्य- सी लाली।।

यहाँ ‘स्वस्थ’ में ‘प्र’ उपसर्ग के प्रयोग से उत्कृष्टता उत्पन्न कर दी गयी है। उपसर्गों के प्रयोग से अन्यत्र भी वक्रता उत्पन्न की गयी है,जो कवि के भाषा- कौशल को प्रगट करती है।कहना नहीं होगा यहाँ राजा वेन के शारीरिक सौष्ठ को पढ़कर कामायनी के मनु का सहसा स्मरण हो आता है-

अवयव की दृढ़ मांसपेशियाँ

ऊर्जस्वित था वीर्य अपार।

स्फीत शिराएँ स्वच्छ रक्त का

होता था जिनमें संचार।।

पुरुष सौन्दर्य की भाँति नारी सौंदर्य के वर्णन में भी कवि की मनोरम कल्पना, चित्रोपम भाषा और कोमलकान्त पदावली का चमत्कार दर्शनीय है। यथा-

१.नव कदम्ब कुसुमों-सी आभा थी नितम्ब पर छायी,

रत्नों से था भरा वक्ष कुछ मध्य भाग कृश ऐसे-

मानो विधि ने काट पुष्टकटि उन्नत अंग संँवारे,

कलित कपोलों पर मकराकृति कुंडल की परछाँई।

नारी के इस सौंदर्य वर्णन में भाषा की शालीनता कितनी मधुर, भव्य और चित्ताकर्षक है! ऐसा ही एक दोहा आलम और शेख का है-

कनक छरी सी कामिनी काहे को कटि छीन।

कटि का कंचन काटि के कुचल मध्य धरि दीन।।

,,

प्रेम मनुष्य की सहजात प्रवृत्ति है। इसके विना कोई मनुष्य रह नहीं सकता। प्रायः सभी कवियों ने प्रेम पर कुछ न कुछ लिखा है। कविवर सुधाकर मिश्र जी प्रेम के सुन्दर और स्वच्छ बिम्ब प्रस्तुत करने में निपुण हैं। इनके प्रेम सम्बन्धी बिम्ब में कल्पना और भावुकता का अतिरेक नहीं, संतुलन है। उसमें अतिशय सूक्ष्मता औरअतीन्द्रियता या स्थूलता और माँसलता नहीं है। आदिराज पृथु और देवप्रभा के ‘प्रथम दृष्टि में प्यार’ की यह मनोहर छवि देखने योग्य है –

कुछ पल रहे खड़े दोनों उस वाचाहत दर्शन से,

मेरु शिखर के ठीक सामने स्वर्णलता ज्यों पावन।

फिर अपना परिचय देते हुए पृथु देवप्रभा से कहते हैं-

१. वेनपुत्र मैं पृथु हूँ रूपसि! ब्रह्मावर्त निवासी,

 

२.हो परन्तु तुम कौन दिव्यता की प्रतिमूर्ति सरीखी?

कठिन साधनारत हिमाद्रि प्रभुता में ज्यों गिरितनया।

विग्रहवती शील – शोभा या योगसिद्धि योगी की

सुन्दरता चरितार्थ कर रही ज्यों समेत सुन्दरता।।

(सर्ग-४, पृ. ८३) ,

उपचारवक्रता के उपयुक्त साधन से कवि ने इन पंक्तियों को भाव – सौन्दर्य में कितनी सहजता से महाकवि तुलसीदास की इस चौपाई के समकक्ष ला दिया है- ” सुन्दरता कहुँ सुन्दर करई।

छबि गृह दीप सिखा जनु बरई।।

पर्वतीय रमणी देवप्रभा का उत्तर भी कम भावमय और संमोहक नहीं है-

१.यक्षसुता हूँ परमपुरुष मैं सफल योग की प्यासी, यौवन की वर्षा में उमड़ी सावन की सरिता – सी।

मन – तुरंग से तंग, अचंचल होने की आशा से,

सीख रही हूँ ब्रह्म- विभव में पूर्ण रूप लय होना।।

२.मैं तो वश में हुई देखते ही देवों सी काया,

शेषनाग- सी प्रबल भुजाएँ, आम्रकूट – सी छाती।

गिरि उपत्यका-जैसा विस्तृत भाल,भाग्य सागर-सा,

सुखवर्षी सन्तोषवर्धनी प्रात: रवि – सी आँखें।।

इस प्रथम दृष्टि के प्रेम में तरुण प्रणयी युगल का आत्म – समर्पण पर्वत की भाँति कितना पवित्र, स्वच्छ, निष्कलुष,विशाल, विस्तृत और गंभीर है।

यह प्रबंध अध्यात्म और भौतिकता का सुन्दर संगम है। इसमें ईश्वर केन्द्रित आस्तिक दर्शन की स्पष्ट झलक मिलती है।योग- साधना में भी गहरी आस्था प्रगट की गयी है। देहात्मवाद, प्रकृतवाद, जड़वाद या अन्य जो भी भौतिकवादी दर्शन हैं, उनका कवि ने बड़े सुन्दर ढंग से विरोध किया है। पाश्चात्य विद्वानों बेंथम और मिल के सुखवाद और उपयोगितावाद तथा अरिटीपस के निकृष्ट स्वार्थ मूलक सुखवाद के लिए कवि के मानस में कोई स्थान नहीं है।

इस काव्य प्रबंध का आरंभ ही बड़ी ललित शब्दावली में विस्मय जन्य जिज्ञासा और रहस्यवादी प्रश्नों से होता है।ये प्रश्न दर्शन के शाश्वत प्रश्न हैं।

पहले सर्ग में दस्युसुता जब राजा वेन से कहती है कि ऐसी कोई सत्ता अवश्य है जो संपूर्ण सचराचर जगत् में व्याप्त है और जिसके कारण प्रकृति के सारे उपादान क्रियाशील हैं। वह घन-घटा, पुष्प-पराग, वर्षा, बीजांकुर, सरि, समुद्र, अग्नि, पवन,पक्षी इत्यादि जो कुछ दृश्यमान है, सबको चला रहा है। वह ईश्वर या ब्रह्म ही है। किन्तु भौतिकवाद का पक्ष लेते हुए नास्तिक राजा वेन कुतर्कों द्वारा इसका खंडन करता है, तो वह रमणी देखिए कितने सहज शब्दों में अपना मत स्थापित करती है। यह भावना- अनुरंजित स्थापन – शैली कितनी श्लाघनीय है! द्रष्टव्य है –

१. किन्तु नाथ! जिसको अलभ्य अथवा अदृश्य कहते हो,

मान जिसे कल्पना- तनय शासन की चाह सजाते,

जिसकी शक्ति और सीमाओं को नकार चलते हो,

थके जा रहे मनुज सुयश उसका ही गाते – गाते।। 

२. तारों की वह चमक सलोनी, धरती की हरियाली,

मन में विलस रही बौद्धिकता कहती उसे न भूलो।

देखो गति निर्बाध काल की,तन की नियति निहारो,

झूठे कौतुक के झूले में व्यर्थ न ऐसे झूलो।।

इस पुस्तक के एक और ्प्रमुख पात्र हैं राजर्षि अंग।वे आदिराज पृथु के पितामह और कवि के जीवनदर्शन के प्रतीक हैं। कवि ने उनके माध्यम से ही इस काव्य का मूल संदेश दिया है। उनके कथन संस्कृत नाटकों के ‘भरत-वाक्य’ जैसे प्रतीत होते हैं।

‘आदिराज पृथु’ प्रबन्ध की भाषा सुमधुर, सुन्दर और स्निग्ध है। इसमें छावाद की थोड़ी-सी कोमलता और प्रगतिवाद की थोड़ी-सी परुषता है। विषयानुसार भाषा कभी छायावादी शब्दावली ग्रहण करती है और कभी प्रगतिवादी शब्द-विन्यास का अनुसरण करती है। इसमें जटिलता या समास –

बहुलता का प्रयोग न के बराबर है। इसमें स्वप्निल संगीतात्मकता, अनुपम प्रवाहमयता और रस का मंजुल माधुर्य है; लयबद्ध ऊर्जा की अभिव्यक्ति का

मनोरम उल्लास है। शब्द-प्रयोग की वक्रताविशिष्ट इस भाषा में मोहक सौन्दर्य है। कवि को सुकुमार मार्ग प्रिय है, इसलिए उसने वैदर्भी रीति काअनुसरण करते हुए समासान्त बहुल क्लिष्ट शब्द-प्रयोग से परहेज किया है। कवि को वर्ण्यविषय के मार्मिक स्थलों की सटीक पहचान है, इसलिए ऐसे स्थलों की भाषा अधिक सजीव और प्रभावकारी है।जहाँ- तहाँ आवश्यकतानुसार कवि ने तत्सम शब्दों के स्थान पर तद्भव शब्दों का प्रयोग किया है, जैसे- बेग, बिना, बाण इत्यादि। कहीं- कहीं ‘ छपकोर’ जैसे खाँटी देशज शब्द का ललित प्रयोग मिलता है।यह सूक्तियों, कहावतों , मुहावरों और अलंकारों से भी पूर्णतः समृद्ध है। कुल मिलाकर यह कहना उचित होगा कि इसमें कामायनी की भाषा के मार्दव, माधुर्य और सौंदर्य के साथ – साथ उर्वशी की भाषा की अलंकृति और आभिजात्य है।

प्रस्तुत प्रबंध काव्य के इतने संदर्भ और आयाम हैं जिन्हें एक आलेख में नहीं समेटा जा सकता।यहाँ पर देशानुराग, प्रकृति वर्णन, पर्यावरण संरक्षण, आतंकवाद, शरणार्थी समस्या, पड़ोसी-धर्म,भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन, राष्ट्रीय एकता, हरित क्रांति, भाईचारा, विश्ववंधुत्व, सीमा सुरक्षा, योग- साधना, पौराणिक कथावस्तु की प्रासंगिकता, संदेश, छंद-योजना, प्रबंधात्मकता जैसे अन्य अनेक संदर्भ-विन्दु हैं, जिन पर बहुत कुछ कहना अभी संभव नहीं है।

इस प्रशंसनीय प्रबंधकाव्य के विहंगावलोकन से प्रतीत होता है कि कविश्री डाॅ. सुधाकर मिश्र जी पौराणिक कथा वृत्त का आन्धानुसरण करनेवाले रचनाकार नहीं हैं। वे परंपरागत संस्कारों की जकड़- बंदी से मुक्त हैं और आधुनिक तर्क-सम्पदा से युक्त हैं। उन्होंने किसी प्रकार की परवशता का अनुभव किये विना, निर्भीक और स्वतंत्र बुद्धि से ‘आदिराज पृथु’ से सम्बन्धित आख्यान पर विचार किया है। इसका कथानक सुगठित, सुचिन्तित और भावना के साथ तर्कबुद्धि से गढ़ा गया है। वह न तो वायवीय है, न अयुक्तिक है और न ही अलौकिक या अयथार्थ है। इसीलिए इसके पात्र हमारे लिए अपरिचित और अलौकिक न होकर हमारे बीच के हमारे अपने प्रतीत होते हैं। कथा मे जहाँ अलौकिकता का आभास होता है, वहाँ भी आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधानों को देखते हुए मानना पड़ता है कि कुछ भी असंभव नहीं है।

यह प्रबंधकाव्य निवृत्ति और प्रवृत्ति के समन्वय का संदेश देता है। प्रवृत्ति पर टिकी हुई निवृत्ति मानव-समाज के लिए शुभकर है। इस प्रकार यह काव्य संसार से पलायन नहीं, कर्मठता के लिए प्रेरित करता है। कवि को जीवन के संघर्षों से घबड़ाकर भागना और मोक्ष के लिए कठोर तप करना पसन्द नहीं है। उसमें जूझने, सीझने और

उसमें से परिपक्व होकर निकलने की शक्ति, ऊर्जा और जीवट है। जिस प्रकार निवृत्तिवादी दर्शन या जीवन-दृष्टि श्रेय नहीं है, उसी प्रकार अत्यधिक भोगवादी दृष्टिकोण भी हितकर नहीं है। श्रेय और प्रेम की मर्यादित सीमा में रहकर ही मानव के भौतिक और आध्यात्मिक जीवन का सही और सटीक विकास और उत्थान हो सकता है। उपनिषदों, जैनों, बौद्धों का अकर्मक अध्यात्मवाद और चार्वाकों का देहाधारित जड़-भौतिक भोगवाद

आधुनिक मानव को अभीष्ट नहीं हैं। लोक से बढ़कर परलोक नहीं है।अंत में,मैं कवि सुधाकर मिश्र जी के

शब्दों में कहना चाहता हूँ, जो इस अनमोल काव्य- कृति का संदेश भी है-

जो तज अपना कर्तव्य पालते तापसव्रत

ऐसे राजा भागी हैं अपयश के अमन्द।

सिंहासन तजकर भी राजा रहता राजा

है नहीं गृहस्थों के हित प्रभु का द्वार बन्द।।

यहाँ राजा के स्थान पर मनुष्य मात्र समझना अधिक संगत होगा।

– रामेश्वर नाथ मिश्र ‘अनुरोध’

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