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निर्भीक स्वर, बेबाक तेवर संगठन भारत

किसी भी देश की सत्ता का संचालन राजनीतिक परिस्थितियाँ नहीं, वहां की अर्थव्यवस्था भी करती है l यदि अर्थव्यवस्था चंद्र लोगों के हाथों की कठपुतली बन जाती है तो पूरे देश की सारी राजनीति को अपने इशारे पर यानि कि उंगलियों पर नचाती है l उस देश में प्रजातंत्रिक व्यवस्था का सच्चा स्वरूप कभी भी कामयाब नहीं हो पाता क्योंकि वास्तविक सत्ता तो वित्त की होती है l कोई भी देश वित्त से पोषित होता है ना की राजनीति के बड़े-बड़े सिद्धांतों एवं कूटनीतिक चालों से l सच्चे अर्थों में प्रजातंत्र की वास्तविक सफलता के लिए यह आवश्यक है कि उस देश की अर्थव्यवस्था यानि कि पूंजी का केंद्रीकरण ना होकर विकेंद्रीकरण के स्वरूप में रहे l ऐसे विचार कुछ लोगों को साम्यवादी सिद्धांतों से प्रेरित
पत्रकारिता जब समाज का दर्पण बनने के साथ – साथ उसकी आवाज़ बन जाये तो वह एक मिशन का रूप ले लेती है। संगठन भारत साप्ताहिक समाचार पत्र इसी अटूट संकल्प के साथ अपने 16 वें गौरवशाली वर्ष में प्रवेश कर रहा है। यह केवल एक समाचार पत्र नहीं बल्कि जनमानस की उन समस्याओं का दस्तावेज़ है जिन्हें मुख्य धारा की चकाचौंध अक्सर अनदेखा कर देती है।
बीते डेढ़ दशक से इस पत्र ने राष्ट्र, प्रांत और समाज के त्रिकोण पर अपनी पैनी दृष्टि बनाये रखी है। चाहे वह ग्रामीण अंचल की बुनियादी सुविधाएँ हों या राष्ट्रीय सुरक्षा और नीति निर्माण के गंभीर विषय, संगठन भारत ने हमेशा तथ्यों की कसौटी पर खबरें परोसी है। एक सजग प्रहरी की भूमिका निभाते हुए इसने सत्ता और समाज के बीच एक पारदर्शी सेतु का काम किया है।
एक समाचार पत्र की सार्थकता केवल समस्या गिनाने में नहीं, बल्कि जनमानस को जागरूक कर समाधान की दिशा दिखाने में होती है। संगठन भारत ने स्थानीय समस्याओं को शासन– प्रशासन की चौखट तक पहुंचाकर अनगिनत सकारात्मक बदलावों की नींव रखी है |
15 वर्षों की यह यात्रा विश्वसनीयता और निष्पक्षता की यात्रा रही है। 16 वें वर्ष में प्रवेश करते हुए यह समाचार पत्र अपनी इसी धारदार लेखनी और लोक कल्याणकारी विज़न के साथ देश और प्रदेश की प्रगति में सहभागी बनने के लिए तत्पर है। संगठन भारत के समस्त पाठकों और टीम को इस मील के पत्थर पर हार्दिक बधाइयों के साथ अनेक अपेक्षाएं भी हैं।
आज का मीडिया, प्रिंट मीडिया, रेडियो, अभी तक बहुत दूर तक आधुनिक किस्म के एक पूर्ण सत्य के निर्माण में लगे नज़र आते हैं, मगर उन्हीं के भीतर बहुत कुछ ऐसा होता है जो उपभोग, अस्मिता, विकेंद्रण और आज़ादी की बात करता है। अपने यहाँ का मीडिया इसे अपने अपने ढंग से हल करता है। एक ज़माना था जब मीडिया का नारा था आज़ादी। गुलामी से आज़ादी। संकीर्णता और रूढ़िवादिता से आज़ादी। और यह आज़ादी मीडिया की उस मध्यवर्ती भूमिका के बिना संभव नहीं है जिसे जनता के प्रति उत्तरदायित्व बोध संभव करता है।
मीडियाकर्मियों को कुछ देर ठहर कर यह सोचना चाहिए कि हाईप और यथार्थ में किस तरह भेद करें, किस तरह सच और यथार्थ परिष्कृत रूप में पाठकों तक,आम जनमानस तक बेलाग पहुँचाया जा सके। आज लाइव मीडिया के युग में जहाँ देश के भाग्य के फैसले तीन घंटे में लिए जाते हैं वहाँ राजनैतिक टिप्पणी भी तीन सेकेण्ड में होगी। जहाँ सब कुछ लाइव होकर भी डेड हो रहा है तो वहाँ प्रिंट मीडिया की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है और हैसियत भी बड़ी हो जाती है। इसी के मद्देनज़र कुछ जुझारू और उत्साही लोगों की एक टीम एकजुट हुई और एक नए समाचारपत्र ने आकर लिया।
समाचारों की दुनिया में एक अविस्मरणीय दिन 30 मार्च 2011, पूरा देश क्रिकेट विश्व कप के स्पर्धा के जोश और उत्साह में डूबा हुआ था, उसी संध्या संचार का समृद्ध वाहक समाचार पत्र, संगठन भारत का उदय हो रहा था। मुंबई के प्रेस क्लब के एक सभागार में इस समाचार पत्र के आरंभिक अंक का विमोचन किया गया। इसे साझा करते हुए मुझे अपार हर्ष हो रहा है कि पंद्रह वर्ष पहले इसी दिन संगठन भारत के विमोचन और लोकार्पण के आयोजन पर मंच से इसकी सफलता और अपने उद्देश्यों की पूर्ती के लिए शुभकामनाएं देने का अवसर मुझे प्राप्त हुआ और मैंने कहा था पत्रकारिता की यह मशाल न तो कभी बुझानी चाहिए और न इसकी रौशनी कभी मंद होनी चाहिए। आज इसकी मद्धिम लौ और तेज हुई है। आज इस साप्ताहिक पत्र ने अपने साजो– सामान के साथ अपनी यात्रा के पंद्रह पड़ाव पार कर लिए हैं, सोलहवें वर्ष की यात्रा में अग्रसर है, फिर से शुभकामना। खबरों की यह यात्रा पाठकों के व्यापक वर्ग के जुड़ाव का प्रतिसाद है।
आज कहा जाता है कि ‘सूचना ही शक्ति है’ जिस व्यक्ति, संस्था, समाज या देश के पास जानकारियां हैं और सभी सूचनाओं से समृद्ध है, उसी के हाथ में शक्ति भी है। यदि सूचनाएँ प्रदान करने का तंत्र विकसित कर लें तो सूचनाएँ सरलता से जनमानस तक पहुंचाई जा सकती है। व्यक्ति से व्यक्ति के बीच परस्पर वैचारिक आदान– प्रदान संवाद कहलाता है। जब एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति या पूरे समूह और समाज तक अपने विचार पहुँचाना चाहता है, अपने विचारों से उनमें वैचारिक चेतना जागृत करना चाहता है तो इसे संचार कहते हैं। संचार सामाजिक चेतना को जागृत और समृद्ध करते हैं। जिस देश के संचार माध्यम सशक्त हैं उनका विस्तार खुले आकाश की तरह व्यापक है और उस देश के विकास की गति तीव्र हो जाती है।
संचार माध्यम सिर्फ सूचनाएँ ही लोगों तक नहीं पहुंचाते बल्कि सूचनाओं के साथ लोगों को शिक्षित करने और मनोरंजन की भूमिकाएं भी निभाते हैं। ये माध्यम लोगों के घरों में परिवार के सदस्य की तरह उपस्थित हो पूरे परिवार को जागृत करने की अपनी भूमिका पूरी जिम्मेदारी से निभाते हैं। आखिर संचार का मुख्य काम क्या है? संचार मुख्य रूप से सूचनाओं, जानकारियों से समृद्ध करता हुआ समाज में सृजनात्मकता, मतैक्य और सूझबूझ को प्रोत्साहित करता हुआ, समाज में सांस्कृतिक एकीकरण को बढ़ावा देता है, ताकि लोगों, समूह और समाज में शांति और सामंजस्य का भाव बना रहे। इन संचार माध्यमों से ही तो पता चलता है शासन व्यवस्था का आधार क्या है, सरकार का रूप कैसा है, सरकार की लोकप्रियता का स्वरूप कैसा है, सरकार जनहित में कितनी सक्रिय है और देश के भविष्य के प्रति कितनी सचेत है और सरकार की इन नीतियों का सही अर्थो में कितना क्रियान्वयन हो रहा है। इन सब पर अपनी पैनी नज़र रखता है संगठन भारत।
आज के इस इलेक्ट्रॉनिक युग में संचार के क्षेत्र में तेजी से विकसित हो रही दुनिया में नित नए अवसर सामने आते रहते हैं किन्तु प्रिंट मीडिया एक दस्तावेज की तरह अपनी जिम्मेदारी के साथ पाठकों के सामने उपस्थित होता है। संगठन भारत साप्ताहिक पत्र अपनी इसी जिम्मेदारी से अपनी भूमिका निभा रहा है। पत्र के संपादक राजकिशोर और सम्पूर्ण संपादक मंडल अपने इस सक्रियता और समर्पण के लिए बधाई के पात्र हैं। इनके पंद्रह वर्षों का अथक परिश्रम, सेवा भाव आगामी वर्षों में उत्तरोतर प्रगति के लिए ऊर्जा पुंज का काम करेगा। गंभीर समाचारों के साथ इसके व्याप्ति का विस्तार हो। संगठन भारत अपनी सार्थकता और उपयोगिता से आम जनमानस के जीवन का अंग बना रहे और पूरी निष्पक्षता के साथ देश और समाज का सजग प्रहरी बना रहे, खबरों के साथ साथ राष्ट्रीय चेतना जागृत करता रहे। मैं संगठन भारत के संपादक राजकिशोर जी एवं पूरी टीम के लिए शुभकामनाओं सहित संगठन भारत को अपनी भूमिका में उत्कर्ष पर पहुँचने की कामना करता हूँ।

आनंद सिंह
पूर्व सदस्य महाराष्ट्र राज्य साहित्य अकादमी
उद्घोषक आकाशवाणी
मुंबई

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