ज़माने को जमाने मे जमाने की ललक देखी।
फ़साने में फसाने को न फ़सने की फ़लक देखी।
गए दिन बीत क्या मेरे मुझे समझा नही जाता।
बताने में ब ताने के बिना ताने लचक देखी।
कभी मैं आरजू मारूँ कभी मरता गया यारों।
न जीना था न जीने पर नगीने सी हनक देखी।
वफ़ा भी बा वफा करता मगर वो बे वफ़ा पायी।
वफाओ पर जफ़ाये भी निराली बे हिचक देखीं।
पड़ी थी कशमकश में जॉ खिजाँ में शोखियां ढूंढू।
बहारें थी बुहारी जा चुकी मैंने कसक देखी।
खुशी आवारगी नाजिल हुई जाती तमन्ना में।
हाथ मे जाम ले कर तिश्नगी भी बे झिझक देखी।
खुशीराम बाजपेई


