न जाने क्यों? अपना मन
अपने मन से ही मिलने से घबराता है,
और निकल जाना चाहता है कतराकर
कि मन का कोना महसूस करता है,
अजीब सा अकेलापन
कचोटता है अपना ही सीना
कि रेगितान की तरह फैली तन्हाई को
बंद कर देना चाहता है दिल के कपाट के अंदर
सुनना चाहता है सागर तटों का कोलाहल और
देखना चाहता है गहरी होती शाम का सिदूरी रंग
एक जमाना गुजर जाता है
खुद से मिले बगैर
कहाँ मिल पाता है वक़्त
अपने से बातें करने का
पूछने का कि तुम खुश हो ना
या कि ये उदासी की परत क्यों है तुम्हारे चेहरे पर
सारा वक़्त गुजर जाता यूँ ही बेरहमी से
कि जैसे लगता
खण्डहरों में बिता आये समय को
और बरबाद कर आये अपने आपको
अनपढ़ी… अनगढ़ी कहानियों के रूप में
जिसे सुनने और देखने की चाहत
क्यों हो किसी के मन में!
मन के शहर में बहुत शोर है।
लेकिन ये मन, मन से कतरा रहा है।
…कात्यायनी सिंह


