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गज़ल/ कभी आहें

कभी आहें निकलती हैं,

कभी आँसू टपकते है।

जिन्हें हालात नें तोडा़,

वही घुट घुट के मरते है।।

हजारों ग़म है दुनियां में,

उठाकर देख लो आँखे।

ग़मो के इस समंदर में,

सदा गिरते संभलते हैं।।

कोई मंजिल को पा लेता,

कोई महरूम है रहता।

यही है जिंदगी अपनी,

जिसे पाकर बहकते हैं।।

ये सांसे भी नहीं अपनी,

तो दौलत का भरोसा क्या?

फना सब कुछ यहां aहोगा,

            अकड़ में झूठे रहते हैं।।

            गीतकार- रसियाकुमार

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