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भारत को भारत ही रहने दो

किसी भी देश का नाम, उस देश की भाषा और वहां के लोगों की संस्कृति ही उस देश को महान और आदर्श बनाती है। उस देश की सभ्यता और उसके विकास का पैमाना भी इन्हीं तीनों बातों पर निर्भर करता है। मगर हम भारतवासी अपने देश के नाम और यहां की भाषा को लेकर आज भी दुविधा में हैं। अभी तक न तो हमारे देश के एकमात्र नाम और देश की राष्ट्रभाषा पर कोई पुख्ता फैसला लिया जा सका है। यानी हम अब तक यह तय ही नहीं कर पाए हैं कि आखिर हमारे देश का नाम भारत है या इंडिया? और दूसरी ओर हमारे देश की राष्ट्रभाषा पर भी कोई मुहर अब तक नहीं लग सकी है। भारत, इंडिया और हिंदुस्तान, हमारा अपना देश इन तीन नामों से जाना जाता है। यह एकमात्र ऐसा देश है जिसका नाम लोग अपनी सहूलियत के हिसाब से प्रयोग में लाते हैं। भारत को सिर्फ भारत नाम से जाना और पुकारा जाए, इधर पिछले कुछ वर्षों में यह मांग बड़ी तेजी से की जा रही है। कई संस्थाएं इसके लिए अभियान भी चला रही हैं। लोगों का मत है कि ‘‘इण्डिया‘‘ शब्द दासता का प्रतीक है, जिसका प्रयोग हमारे संविधान तथा समस्त कानूनों में किया गया है। भारतवासी चाहते हैं कि गुलामी के इस प्रतीक को शीघ्रातिशीघ्र हटाया जाए। ताकि हमारा देश केवल एक ही नाम से जाना जाए और वह नाम है भारत। आजादी के 75 वर्ष बाद भी हमारी सरकारें भारत को सिर्फ भारत कहलाने का भी दर्जा नहीं दिला पायी हैं। यह बड़े ही शर्म की बात है। इतना ही नहीं हम भारतवासियों का दृढ़ मत है कि हमारे पवित्र धर्म ग्रन्थों की भाषा संस्कृत, विश्व की सभी भाषाओं की जननी है, जो आदिकाल से भारतीय सभ्यता और संस्कृति का वैज्ञानिक अधार रही है। किसी राष्ट्र की मूल सभ्यता और संस्कृति के अनुरूप राष्ट्रभाषा किसी भी स्वाभिमानी राष्ट्र की आस्था, अस्मिता और गौरव का प्रतीक होती है। खेद है कि आज, स्वाधीनता -प्राप्ति के पचहत्तर वर्ष व्यतीत हो जाने पर भी, इच्छाशक्ति के अभाव में, हम अपने भाषाई गौरव को पुनर्स्थापित करने के प्रति गंभीरता से सचेष्ट नहीं हो सके हैं। आवश्यकता है कि वैदेशिक भाषाई मानसिक दासता के बंधन तोड़कर, अब हम संस्कृत की ज्येष्ठ पुत्री यानी अपनी हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिस्थापित करें। दासता बोधक दंश से मुक्त होवें और आत्मगौरव की अनुभूति करें। हिन्दीतर भाषा भाषी प्रदेशों में, प्रारम्भिक कक्षाओं तक, वहाँ की मातृभाषा में शिक्षा की व्यवस्था स्वीकारते हुए, सहज और सग्राह्य ‘हिन्दी भाषा‘ को भारतवर्ष की ‘राष्ट्र-भाषा‘ घोषित करने की जरूरत है। साथ ही साथ सभी न्यायालयीन निर्णयों को अनिवार्यतः हिंदी में भी लिखे जाने का प्राविधान बनाया जाना चाहिए। ताकि सभी को न्यायालयीन निर्णयों की जानकारी या उसे समझने में किसी भी प्रकार की कोई कठिनाई न हो। शिक्षा की व्यवस्था हिंदी माध्यम से हो, इसे चरणबद्ध योजना के तहत लागू किया जाए। संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी को मान्यता दिलवाने हेतु सभी आवश्यक प्रयास किये जाने चाहिए।

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