मुंबई (सं. भा.) रेजिडेंट डॉक्टरों को चिकित्सा शिक्षा के दौरान अपर्याप्त ट्यूशन फीस, हॉस्टल जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी जैसी कई गंभीर समस्याओं और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इसका असर चिकित्सा छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है और मरीजों की देखभाल प्रभावित होती है। परिणामस्वरूप मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने के लिए रेजिडेंट डॉक्टरों के संगठन एमएआरडी द्वारा राज्य सरकार का ध्यान बार-बार आकृष्ट कराया लेकिन इसे नजरअंदाज किया जा रहा है, इसलिए मार्ड ने नागरिकों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने के लिए महाराष्ट्र के दौरे पर हाल ही में आईं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखा है और इसके समाधान के लिए हस्तक्षेप करने की मांग की। महाराष्ट्र में मार्ड डॉक्टर की करीब 8 हजार संख्या है।
राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग के निर्देशानुसार देश में स्नातकोत्तरों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन उसकी तुलना में राज्य के मेडिकल कॉलेजों में हॉस्टल और इंफ्रास्ट्रक्चर में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है, इसलिए रेजिडेंट डॉक्टरों को हॉस्टल में रहना पड़ रहा है, इसलिए रेजिडेंट डॉक्टरों के लिए लीज पर आवास की व्यवस्था करने की मांग की जा रही है। राज्य के कुछ मेडिकल कॉलेजों में लीज पर आवास की व्यवस्था की जा रही है, लेकिन ये प्रक्रिया बहुत धीमी है। इसी तरह महाराष्ट्र में रेजिडेंट डॉक्टरों को मिलने वाली ट्यूशन फीस अन्य राज्यों के डॉक्टरों की तुलना में बहुत कम है। मार्ड ने पत्र में रेजिडेंट डॉक्टरों को वित्तीय स्थिरता प्रदान करने के लिए स्टाइपेंड में नियमितता लाने के साथ-साथ स्टाइपेंड बढ़ाने का भी अनुरोध किया है, क्योंकि स्टाइपेंड हर महीने देरी से मिल रहा है।

गौरतलब है कि अपर्याप्त बुनियादी ढांचा अन्य राज्यों की तुलना में अनियमित और कम ट्यूशन फीस, अनिश्चित काम के घंटे, काम का बढ़ता दबाव कई रेजिडेंट डॉक्टरों में डिप्रेशन का कारण बन रहा है। डॉक्टरों में आत्महत्या की दर बढ़ रही है। मेडिकल छात्रों की आत्महत्या के मामले में महाराष्ट्र देश में दूसरे स्थान पर है। यदि इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो भविष्य में स्वास्थ्य देखभाल की गुणवत्ता और भी खराब होने की संभावना है। तय करें काम के घंटे मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के दिशा- निर्देशों के अनुसार रेजिडेंट डॉक्टरों के काम के घंटों को नियमित किया जाना चाहिए।
निर्देशों के अनुसार प्रति सप्ताह अधिकतम 48 घंटे कार्य, न्यूनतम एक साप्ताहिक अवकाश, प्रति पाली अधिकतम 12 घंटे कार्य करना निश्चित हो। इसी तरह मार्ड ने एक पत्र में अनुरोध किया है कि जो मेडिकल छात्र अपनी स्नातकोत्तर सीट खाली करना चाहते हैं, उन पर कोई जुर्माना नहीं लगाया जाना चाहिए।


