57,509 करोड़ की पूरक मांगें पेश
मुंबई(स भा)। महाराष्ट्र विधानसभा का मानसून सत्र सोमवार को विकास और सियासी गर्मी के मेल के साथ शुरू हुआ। एक ओर जहां सरकार ने आधारभूत ढांचे और सामाजिक योजनाओं के लिए 57,509 करोड़ रुपये की विशाल पूरक मांगें पेश कर विकास का रोडमैप रखा, वहीं दूसरी ओर स्कूलों में हिंदी पढ़ाई को लेकर उठा विवाद सत्र के पहले दिन ही सदन का पारा चढ़ा गया।
सत्र के पहले ही दिन उपमुख्यमंत्री एवं वित्त व योजना मंत्री अजित पवार ने विधानमंडल में 57,509 करोड़ 71 लाख रुपये की पूरक मांगें प्रस्तुत कीं। यह पूरक निधि राज्य के आधारभूत ढांचे के विकास जैसे सड़क, मेट्रो और सिंचाई परियोजनाओं के साथ-साथ सिंहस्थ कुंभ मेले की योजना और उसके क्रियान्वयन के लिए खर्च की जाएगी। इसके अलावा, महात्मा ज्योतिराव फुले आरोग्य योजना, संजय गांधी निराधार अनुदान योजना, पिछड़े वर्ग के विद्यार्थियों की छात्रवृत्ति और वंचित व दुर्बल समाज के कल्याण हेतु भी इस निधि का उपयोग होगा।
प्रस्तुत पूरक मांगों में 19,183 करोड़ 85 लाख रुपये अनिवार्य खर्चों के लिए प्रस्तावित किए गए हैं, जबकि 34,661 करोड़ 34 लाख रुपये योजनागत व्यय के अंतर्गत और 3,664 करोड़ 52 लाख रुपये केंद्र सरकार से प्राप्त होने वाली प्रायोजित योजनाओं के तहत रखे गए हैं। हालांकि पूरक मांगों का कुल आकार 57,509 करोड़ रुपये से अधिक का है, लेकिन राज्य सरकार पर इसका वास्तविक शुद्ध भार लगभग 40,644 करोड़ 69 लाख रुपये ही होगा।
इन पूरक मांगों में सबसे अहम हिस्सा 15वें वित्त आयोग की सिफारिशों पर खर्च किया जाएगा। इसके तहत 11,042 करोड़ 76 लाख रुपये अनुदानों के रूप में आवंटित किए गए हैं। मेट्रो प्रकल्पों और स्थानीय निकायों को स्टैंप शुल्क अधिभार की प्रतिपूर्ति हेतु 3,228 करोड़ 38 लाख रुपये रखे गए हैं, जिससे शहरी आधारभूत ढांचे को मज़बूती और मेट्रो सेवाओं के विस्तार में सहायता मिलेगी।
वहीं सहकारी क्षेत्र को भी सरकार ने अहमियत दी है। राष्ट्रीय सहकार विकास निगम (NCDC) के माध्यम से सहकारी चीनी मिलों को कार्यशील पूंजी उपलब्ध कराने के लिए 2,182 करोड़ 69 लाख रुपये मार्जिन मनी लोन के रूप में स्वीकृत किए गए हैं। यह पूरक बजट राज्य के सर्वांगीण विकास और सामाजिक कल्याण योजनाओं को गति देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
लेकिन इन विकास योजनाओं के बीच, राज्य सरकार को सत्र की शुरुआत में ही एक बड़े विवाद का सामना करना पड़ा, जब महाराष्ट्र के विद्यालयों में पहली से पांचवीं कक्षा तक हिंदी भाषा की पढ़ाई शुरू करने के विरोध के चलते राज्य मंत्रिमंडल ने तीन भाषा नीति को रद्द कर दिया। विपक्ष ने इसे मराठी भाषा के प्रति अन्याय बताते हुए सरकार पर तीखे हमले किए, जिससे सत्र के पहले ही दिन हंगामे का माहौल बन गया।
सत्र में कुल 12 विधेयक पेश किए जाएंगे। भले ही सियासी गलियारों में गर्म हवाएं बह रही हों, लेकिन सरकार के लिए यह मानसून सत्र विकास परियोजनाओं और सामाजिक कल्याण योजनाओं को गति देने के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। देखना दिलचस्प होगा कि सत्र के अगले दिनों में विकास की यह गाड़ी कितनी रफ्तार पकड़ पाती है या राजनीतिक विवाद इसकी रफ्तार पर ब्रेक लगाते हैं।


