सखी हो आग लगै नईहर में,
अब हम ससुरै जइबै ना।
काकी हमसे घास करावै,अउरी भइसिन के धोअवावै।
रोई सुसुक सुसुक हम घर में,
अब हम ससुरे जइबै ना ।
बत्थै रोज कमरिया मोरी, माहुर खोजीं चारौं ओरी।
लटकल जिनगी मोर अधर में,
अब हम ससुरे जइबै ना ।
काका जब देखा गरिआवै, लाठी लेईके मारन धावैं।
निक ना लगै इहाँ करकर में,
अब हम ससूरे जइबै ना।
जब से छोडि के गईनी माई,दुखवा केके भला सुनाई।
दिनभर भागल फिरीं रहर में।
अब हम ससूरे जइबै ना।
सखी हो आग लगै नईहर में****
गीतकार: रसियाकुमार


