आ मौत तुम्हें अपनालूँ मैं,
जीने की तमन्ना शेष नहीं।
जीते जीते थक हार गया,
बाकी अब कोई क्लेश नहीं।।
है जख्म मुझे अपनो से मिला,
पग पग पर मुझको लूट लिया।
क्या दर्द बताउं मैं दिल का,
हर वक्त जहर का घूँट पिया।।
सब दफन है मेरे सीने में,
रह रहकर कभी उभरते है।
जब मौका मिलता है उनको,
वो सारी बातेँ कहते हैं।।
मैं सोच सोचकर दंग रहा,
क्या यूँ हीं दिन ये बीतेगा।
या इस जीवन की बगिया को
कोई माली आ सींचेगा।।
गीतकार; रसियाकुमार


