मेरे बनाये दोस्त सब नाकाम हो गये।
इस मुंबई शहर में गुमनाम हो गये ।।
सालों से बनाया था बुरे वक्त के लिये।
करतब सेअपने ये सभी बदनाम हो गये।।
समझा था हमसफर,पर मेरे हो नहीं सके।
इस जिंदगी में औरों के वो नाम हो गये।।
अंजामे दोस्ती में दगा दे गये दे गये मुझे।
रिस्ता-ए-पाक यूँ हीं सरेआम हो गये।।
रसिया समझके अपना ,क्या बुरा किया,
अपने हीं,अपनो से कत्लेआम हो गये।।
गीतकार: रसियाकुमार


