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Homeअन्यकविता-ग़ज़लआज के परिवेश पर लिखी कविता

आज के परिवेश पर लिखी कविता

कलयुग पांव पसारा भइया।

लुप्त हो रहीं खग गौरइया।।

चील गिद्ध भी जब मड़राते!

मरे हुए डांगर को खाते!

 सड़ैं जानवर  नहीं पुछइया।।

मेहमानों से लाग नहीं है!

गांव बड़ेरी  काग नहीं है!

छप्पर छानी नहीं मड़इया।।

सूखा  कुआं  नहीं है पानी!

जोड़ी बैला लगे कहानी!

बछड़े से बिछुड़ी है गइया।।

गांवों में चौपाल नहीं अब!

पौढ़ कहीं खुश हाल नहीं अब!

जयकारे जो धरे रुपइया।।

— सरोज सिंह ‘सजल’

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