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कविता

छलकेंगे सुख से आद्र नयन

अधरों की छब मुस्कायेगी,

तेरी श्रद्धा,संघर्ष, सुश्रुषा,

रंग कभी तो लायेगी,

एकांत निशा जब आयेगी,

घनघोर निराशा छायेगी,

भूली बीती बातें तेरी

स्मरण कभी तो आयेगी l

है क्रंदन व्यर्थ गया,

और रुदन भी निरर्थ गया,

है आशा करुण पुकार कभी,

निद्रा से उसे जगायेगी

एक दिन प्रसन्नता छायेगी,

क्लेश व्यथा मिटायेगी,

तमस मिटाकर त्वरित सूर्य की

स्वर्णिम प्रभा लुटायेगी

पायेगा नव आयाम आत्मशक्ति ही विजय दिलायेगी,

त्रास भस्म कर देने वाली,

हिय प्रकाश भर देने वाली,

सुहृत ज्योति ही आशाओं का दीपक कभी जलायेगी l

प्रियंवदा मिश्रा मेघवर्णा ….

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