वे राधा के कान्ह
…ओम प्रकाश
बहुत पहले मैंने लिखा था- “होते जो राजा रवि वर्मा, और उन्होंने देखी होती डॉ. धर्मवीर भारती और पुष्पा भारती की युगल छवि, तो देश और काल को राधा और कृष्ण का मुकम्मिल चेहरा मिल गया होता।” गीत गोविन्द मेरी प्रिय रचनाओं में है। और विद्यापति की रचनाओं में तो अभी डूबा हुआ ही हूँ। ` कुञ्ज भवन ते निकसलि रे रोकल गिरधारी ‘ को फिल्म ज़फराबाद जौनपुर आख्यान के लिए रिकॉर्ड कर रहा हूँ। और गा रहे हैं दरभंगा ध्रुपद घराने के जाने-माने गायक पं. सुखदेव चतुर्वेदी। और इंद्राणी के अधोलोक में जाने का, दुनिया का प्रथम प्रेम गीत भी रिकॉर्ड कर रहा हूँ, जिसका संगीत देश के जाने-माने संगीतकार श्री कुलदीप सिंह जी संजो रहे हैं। लेकिन नहीं जानता कि जयदेव या विद्यापति ने या कृष्ण काव्य के दूसरे रचनाकारों ने कृष्ण और राधा के प्रेम को केवल लिखा या जिया भी। या रागवृंत भी इंद्राणी के प्रेम को कितना अपना पाया। लेकिन, कनुप्रिया के लेखक ने जो जिया उसे लिखा, और जो लिखा, उसे जिया। और कनुप्रिया की भी कोई तस्वीर अलहदा बनती हो तो फिर वह एक ही सर्वकालिक तस्वीर बनेगी आत्मा की उजास के प्याले से प्रीति का रस पीती सजग, सचेत, आत्मवंत, जीवंत वृषभानु दुलारी की।
१९९० या ९१ रहा होगा। मुंबई विश्वविद्यालय के दीक्षा सभागार में डॉ. भारती ने कनुप्रिया का पाठ किया। सामने पुष्पा जी बेठी थीं। और एक-एक शब्द उन्हें परिलक्षित करके पढ़े जा रहे थे। भावविभोर था सभागार। नृत्यांगना प्रोतिमा बेदी उठ कर नाचने लगी थीं। उस दिन सभागार में दोनों कृष्ण मौजूद थे। वृंदावन में रास रचाने वाले गोपीनाथ भी, और अक्षौहिणी सेनाओं के स्वामी, योगेश्वर, परमेश्वर, सर्वेश्वर द्वारिकाधीश भी। उस दिन पुष्पा जी का क्या रूप रहा होगा ? उलाहना देती राधा में क्या रुक्मिणी भी किंचित उतरी होंगी? नहीं जानता। परिवेश के अपने अंतर होते हैं। लेकिन, यह बात बहुत विश्वास से कह सकता हूँ, कृष्ण ने गांधारी का श्राप जब स्वीकार किया होगा तो वह श्राप केवल प्रभु और परात्पर ने ही स्वीकार नहीं किया होगा; वह श्राप उस गोप बालक ने भी स्वीकार किया होगा, जो कभी वृन्दावन में गोप बालाओं को बांसुरी सुनाता था, और उनके साथ रास-महारास रचाता था।
सूरदास का वह पद सामान्य नहीं है- ऊधो, मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं। ब्रज नहीं बिसरता। आप कुछ भी हो जाएँ, वह साथ-साथ चलता है।

सोचता हूँ, भारती जी ने पुष्पा जी को खूब प्रेम पत्र लिखे होंगे; गहन प्रेम के; योगेश्वर भी हुए, परमेश्वर भी हुए, यश और कीर्ति की पराकाष्ठा पर पहुंचे, हिंदी के सर्वश्रेष्ठ और गोत्रवाले संपादक हुए, लेकिन उस कान्ह को राधा ने कितना संवारा होगा; पुष्पा जी को जब भी देखता हूँ, यह बात मन में बरबस आती है, कि जिस कान्ह को हम, धर्मयुग के लोग जानते हैं, वे राधा के कान्ह हैं। वे, वे भारती जी हैं, जो एक होते हुए भी युगलमूर्ति हैं। अर्धनारीश्वर की कल्पना या स्वीकृति में समय ने शायद इस युगल मूर्ति कल्पना को भी समाहित किया रहा हो।
खैर, यह हुई कुछ बात, जिसे मैंने यूं ही आपके विचार के लिए छोड़ दी। हाल में ही दिल्ली से लौटा। एनएसडी में रंगकर्मी डॉ. प्रकाश झा से मिलने गया तो मंडी हाउस वाले सिरे पर वहाँ होने जा रहे नाटकों की बड़ी -सी होर्डिंग लगी थी। सबसे बड़ी तस्वीर अंधायुग की लगी थी। वह तस्वीर गर्व ही नहीं दे रही थी, अधिकार पूर्वक बढे चलो, सारा संसार तुम्हारा है का सुकून भी दे रही थी। कल, २५ दिसंबर, २०२४ को बांद्रा स्थित साहित्य सहवास पहुंचा तो मन होने के
एहसास से भरा था। भारती जी और पुष्पा जी मुझे हमेशा अपने होने का यह अहसास देते हैं। गुरु, पिता, गोत्रधारक, कुलपुरुष यही एहसास देते हैं। आत्मवान होने का एहसास। घर पहुंचा, पुष्पा जी को प्रणाम किया ; आशीर्वाद लिया; वे तनिक भी इग्ज़र्ट न करें, इस बात की सावधानी भी बरती और विनती की।
सीढ़ियों पर चढ़ने के साथ ही भारती जी की उपस्थिति का एहसास हो रहा था। बैठक में जब भारती जी के चित्र पर पुष्पार्पण किया गया तो, जैसे वे साक्षात वहां मौजूद थे। हठात घर सम्भालनेवाली ताई साहब के मुख से निकला- “वे बहुत प्रसन्न हैं, सभी को आशीष दे रहे हैं। ” उन्हें इस तरह बोलते मैंने पहली बार सुना।
हाँ, वे तो हैं। अनेकानेक रचनाओं से, धर्मयुग के पैमाना बन गए संपादन से, वाणी से, बोल से, चिंतन से, चरित्र से ही वे नहीं हैं; हम लोग जिन्होंने उनकी छत्रछाया में काम किया है, कई बार इस बात का एहसास करते हैं कि वे पहले की तरह ही साक्षात्की , स्नेह लिए उपस्थित हैं। १९९७ में वे बिछुड़े थे हम सभी से। लेकिन कभी पल भर भी एहसास नहीं हुआ कि वे नहीं हैं। इसी एहसास के चलते पुष्पा जी ने अस्थियों का एक छोटा-सा अंश अभी भी संजो कर रखा है। सृजन-शिव की मुनादी यही है कि जिन्हें धर्मवीर भारती कहा जाता है, उन्होंने जो किया, वह साहित्य और संस्कृति का, चिंतन और जीवनदर्शन का, लक्ष्य और कर्तव्य का एक अमिट हिस्सा है। वह है, और दीर्घकाल तक रहेगा।
भारती जी का जन्मदिन था। उनकी प्रिय मिठाई इमरती ले ही जानी थी। लेकिन इमरती अब मुंबई में मिठाई की दुकानों पर जैसे बननी ही बंद हो गयी है। पहले से आर्डर दीजिये तभी बनेगी। कई जगह खोजने के बाद आखिरकार मालाड में एम एम मिठाईवाले के यहां मिली। वहां भी केवल ६०० ग्राम थी। गरम कराया, पैक कराया, ले गया; लेकिन अगली बार से अब जौनपुर की बेनीराम की इमरती मंगाई जाएगी।
१६ जनवरी के वाणी प्रकाशन द्वारा आयोजित किये जा रहे डॉ, भारती जन्मशती कार्यक्रम का अब इंतज़ार है। इस कार्यक्रम के बाद पुष्पा जी के स्वास्थ्य को देखते हुए जो भी अनुकूल समय लगेगा, एक बार धर्मयुग के लोगों की बैठक साहित्य सहवास में फिर होगी। और, जून में एक बड़ा व्याख्यान कार्यक्रम भी आयोजित किया जायेगा। जिसमें शामिल होने के लिए आप सभी अभी से आमंत्रित हैं।


