दुनियाँभर के भ्रष्टाचारी,
भरे पडे़ है भारत में।
इसीलिए न्याय भी नहीं
मिलता यहाँ अदालत में।।
माँग माँगकर थक जाते है,
पर पाते ना हक अपना।
सुख इनकी झोली में ऐसे,
लगता है जैसे सपना ।।
आखिर ब्यथा कहें तो कैसे,
कौन यहाँ सुनने वाला ?
लूट पाट के चक्कर में हीं,
धधक रही मन की ज्वाला।।
यहाँ अमीरों की बस्ती में,
मानवता भी रोती है।
और गरीबों की तकदीरें,
गहरी नींद में सोती है ।।
रिश्वतखोरी से हीं ऐसा,
हिंदुस्तान का हाल हुआ।
निर्थन व गरीब का जीवन,
बदतर और बेहाल हुआ।।
गीतकार: रसियाकुमार


