मायानगरी में रहना अब,
है सबके बस की बात नहीं।
हर कोई रहता ब्यस्त यहाँ,
आराम के लिए रात नहीं।।
दिनचर्या में बदलाव नहीँ,
नित वही काम हीं करना है।
घुटघुट करके हीं अब लगता,
जीवनभर यूँ हीं मरना है।।
संघर्ष सदा करता आया,
तनहा रह करके मैं अपना।
पर सुख की बदली दिखी ,
मुझको लगता जैसे सपना।।
यह दौर उम्र का अंतिम है,
इसमें शुकून गर मिल जाये।
तो धीरे से मुरझाई कली,
एक बार कसम से खिल जाये।।
प्रारब्ध बिगाड़ा है हमने,
या कर्मो का यह लेखा है।
ईश्वर हीं जानेगा बेहतर,
हाँ किसने इसको देखा है।।
गीतकार:रसियाकुमार


