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लोकगीत

दगा दे गइला काहें सँवरिया,

नजरिया से दूर कइला हो।

जइसे तड़पीला जलबिन मछरिया,

नजरिया से दूर कइला हो।।

 

राउर बिना मोरा लागेना मनवां।

कतहूँ से दर्शन दिखा जा सजनवां।।

रोज अँखिया निहारै डगरिया,

नजरिया से दूर कइला हो।

दगा दे गइला काहें सँवरिया****

 

रतिया में निदिया ना दिनवा में चैना।

कईसे कहीं सईयां दिलवा क बैना।।

काहें भूल गइला सैंया नगरिया,

नजरिया से दूर कइला हो।

दगा दे गइला काहें सँवरिया****

 

रसिया पिया अब ना धडकन बढा़वा।

कउनों सवत  से ना मनवां  लगावा।।

भोरे बोलेला कागा अटरिया,

नजरिया से दूर कइला हो।

दगा दे गइला काहें सँवरिया****

नजरिया से दूर कइला हो।.

 

गीतिकार: रसियाकुमार

 

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