बांदा (सं. भा.)। परिवहन निगम की पुरानी बसों से सफर हिचकोले खा रहा है। खिड़की व दरवाजों के शोर करने से यात्रियों का सिर दर्द होने लगता है। विभाग पुरानी बसों को डेंट-पेंट कराकर सड़कों में दौड़ा रहा है। जिसका खामियाजा यात्रियों को उठाना पड़ता है। वहीं यात्री कई-कई घंटे देरी से पहुंचते हैं। जिससे उनका सफर दुखदायी बन जाता है।
परिवहन विभाग के बांदा डिपो में इस समय 135 बसों का बेड़ा है। इसमें खुद विभाग की जहां 132 बसें हैं वहीं तीन बसें अनुबंधित चल रही हैं। मौजूदा बसों को बांदा-कर्वी, बांदा-पैलानी, बांदा महोबा मार्ग आदि में चलाने के साथ लंबी दूरी तक बांदा से गोरखपुर, बांदा से फतेहपुर बाया लखनऊ, बांदा से रूद्रपुर बाया देवरिया, बांदा से आगरा बाया मथुरा, इलाहाबाद व कानपुर चलाई जा रही हैं। विभाग की ओर से एक तरफ जहां किराए की दर बढ़ाई गई है। वहीं यात्रियों की सुविधाओं को नजर अंदाज किया जा रहा है। बांदा डिपो की तकरीबन दर्जन भर बसें अपनी दस लाख किलोमीटर व चलने की आठ वर्ष समय सीमा पूरी कर चुकी हैं। इसके बावजूद बसों का संचालन बंद नहीं किया जा रहा। सूत्रों की मानें तो दो बसें अपनी समय सीमा पूरी करने के बाद नीलामी के कगार पर पहुंच गईं थीं। खटारा हो चुकी बसों का रजिस्ट्रेशन तक समाप्त कर दिया गया था। यह और बात है कि विभाग ने बसों को नीलाम करने की जगह उनकी काया बदलने की कवायद शुरू कर दी। बसों को दोबारा सड़क पर चलाने के लिए उसकी बाडी तक नई कर दी गई। हाल तो यहां तक बने हैं कि बसों के पुराना हो चुकने से यात्रियों को परेशानी उठानी पड़ती हैं। कम दूरी की कई बसों में तो सफर करते समय दरवाजे व खिड़कियों के शोर से यात्रियों का सिर दर्द करने लगता है। इसके अलावा लंबी दूरी के यात्रियों को दो गुना समय लगाकर यात्रा करनी पड़ती है।
बसों के संचालन के लिए दो वर्ष का समय मुख्यालय से बढ़ाया गया है। जिसके चलते समय सीमा पूरी कर चुकी बसें अभी बदली नहीं गई हैं। जिन बसों में कमियां थीं उन्हें ठीक करा दिया गया है।
यात्रियों को बीमार कर रहीं खटारा बसें
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